देहरादून। उत्तराखंड में मदरसों की नई व्यवस्था लागू होने के सवा तीन महीने बीत जाने के बाद भी बच्चों को पीएम पोषण योजना का भोजन और एनसीईआरटी की किताबें नहीं मिल पा रही हैं। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल सहित राज्य के विभिन्न जिलों में इस प्रशासनिक देरी के कारण बच्चों की पढ़ाई और पोषण दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
मदरसा बोर्ड समाप्त होने के बाद शिक्षा विभाग ने 76 और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने 35 मदरसों को मान्यता दी है। इसके बावजूद अब तक पीएम पोषण योजना का लाभ देने के लिए स्पष्ट शासनादेश जारी नहीं हो सका है। शिक्षा निदेशालय द्वारा जिलों से रिपोर्ट मांगे जाने के बाद भी योजना धरातल पर शुरू नहीं हो पाई है।
इस मामले पर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी ने बताया कि मदरसों को नियमानुसार सभी सुविधाएं दी जाएंगी। उन्होंने कहा कि मिड-डे-मील के लिए शिक्षा विभाग से लगातार समन्वय किया जा रहा है और कक्षा 9 से 12 तक दीनी तालीम का नया पाठ्यक्रम भी जल्द प्रकाशित किया जाएगा।
दूसरी ओर, केबीएन एजुकेशनल एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी के सचिव निजाम अख्तर ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने बाल अधिकार संरक्षण आयोग और अल्पसंख्यक आयोग से हस्तक्षेप की मांग करते हुए शिक्षा विभाग और प्राधिकरण को पक्षकार बनाकर हाई कोर्ट में याचिका दायर करने की चेतावनी दी है।
राज्य में पहले 452 पंजीकृत मदरसे संचालित थे, जिनमें से 227 मदरसे खुद बंद हो चुके हैं और 19 को सील कर दिया गया है। मुस्लिम मामलों के जानकार खुर्शीद अहमद सिद्दीकी ने सवाल उठाया है कि चंदे से चलने वाले इन बंद मदरसों के बच्चों की शिक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी आखिर कौन तय करेगा।

