ऋषिकेश। उत्तराखंड के प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संस्थान एम्स ऋषिकेश में एक कार्मिक की नियुक्ति प्रक्रिया और दस्तावेज सत्यापन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। संस्थान में तैनात एक कर्मचारी के आधार कार्ड और हाईस्कूल प्रमाणपत्र में दर्ज जन्मतिथि अलग-अलग पाई गई है। चालू वर्ष के इस मामले ने एम्स प्रशासन की चयन प्रणाली और प्रारंभिक जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगा दिया है।
यह पूरा मामला नियुक्ति के तुरंत बाद सामने आने के बजाय तब उजागर हुआ, जब कर्मचारी वेतन संबंधी औपचारिकताएं पूरी कर रहा था। इस विसंगति को लेकर एम्स प्रशासन और आवेदकों के दावों में विरोधाभास देखने को मिल रहा है। जहां प्रशासन का तर्क है कि नियुक्ति के समय आधार कार्ड अनिवार्य दस्तावेज नहीं होता, वहीं अभ्यर्थियों का कहना है कि आवेदन करते समय आधार कार्ड अपलोड करना आवश्यक प्रक्रिया का हिस्सा है।
एम्स ऋषिकेश के पीआरओ डॉ. श्रीलॉय मोहंती ने इस मामले में संस्थान का पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि नियुक्ति के दौरान आधार कार्ड आवश्यक नहीं था और कर्मचारी के अन्य सभी दस्तावेज सही पाए गए थे। उन्होंने बताया कि केवल वेतन खाता खुलवाने के लिए आधार की आवश्यकता थी, जिसमें दर्ज गलत जन्मतिथि को संबंधित कर्मचारी ने बाद में दुरुस्त करा लिया था।
दस्तावेजों में पाई गई इस गड़बड़ी के कारण कर्मचारी को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा और उसका करीब छह महीने तक का वेतन रुक गया। लेखा विभाग में जब वेतन प्रक्रिया के लिए कागजात जमा किए गए, तब यह मामला पकड़ में आया। हालांकि, एम्स प्रशासन ने विसंगति दूर होने के बाद अब संबंधित कर्मचारी का रुका हुआ वेतन जारी कर उसे नियमित भुगतान शुरू कर दिया है।
हालांकि, इस मामले ने एम्स जैसी प्रतिष्ठित संस्था में नियुक्ति से पहले होने वाले दस्तावेज सत्यापन की गंभीरता पर बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नियुक्ति पत्र जारी करने से पहले ही सभी प्रमाणपत्रों की बारीकी से जांच की गई होती, तो जन्मतिथि में अंतर की यह गड़बड़ी शुरुआती स्तर पर ही पकड़ी जा सकती थी।
अब प्रशासनिक हलकों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर चयन के वक्त सत्यापन का काम किस स्तर पर किया गया था। इसके साथ ही, इतनी बड़ी विसंगति सामने आने के बावजूद किस आधार पर और किन नियमों के तहत इसका समाधान किया गया, इस पर भी एम्स प्रशासन से जवाब मांगा जा रहा है।

