उत्तराखंड छात्र राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव: छात्राओं ने 438 से अधिक पदों पर जीत दर्ज कर रचा नया इतिहास

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देहरादून। देहरादून के राज्य विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में हाल ही में संपन्न हुए छात्रसंघ चुनावों में छात्राओं ने 438 से अधिक पदों पर चुनकर आने के साथ एक नया और ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया है। उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्राओं की लगातार बढ़ती सक्रियता और बेहतरीन नेतृत्व क्षमता का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसका असर पूरे प्रदेश की शैक्षणिक व्यवस्था पर देखने को मिल रहा है।

छात्र राजनीति और परिसरों के इतिहास में यह पहला ऐसा अवसर है जब छात्राओं ने कुल पदों में से आधे से अधिक हिस्से पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। विशेषज्ञों का मानना है कि छात्र संघ चुनावों से निकले इस नए और मजबूत नेतृत्व से भविष्य में मुख्यधारा की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी।

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यह पहला मौका था जब सरकार की ओर से राज्य विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्राओं के लिए छात्रा उपाध्यक्ष, संयुक्त सचिव और विश्वविद्यालय प्रतिनिधि का पद आरक्षित किया गया था। हालांकि चुनी गई 438 से अधिक छात्राएं केवल इन आरक्षित किए गए पदों तक ही सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर अध्यक्ष और सचिव जैसे शीर्ष पदों पर भी शानदार जीत हासिल की है।

विभिन्न ग्रामीण और शहरी महाविद्यालयों से छात्राओं ने अपनी जीत का परचम लहराया है, जिसके तहत प्रमुख विजयी छात्राओं में बलुवाकोट से दीया बिष्ट, सोमेश्वर से प्रियंका जोशी, कांडा से लक्ष्मी, चौखुटिया से सीमा जोशी, द्वाराहाट से हिमांशी बिष्ट, कूणीधार मनीला से प्रीति रावत, तल्ला सल्ट से मनीषा, गणाई गंगोली से मनीषा जोशी और बनबसा से अनुष्का ने शानदार जीत हासिल की है। इसके अलावा, कई अन्य राजकीय और अशासकीय महाविद्यालयों में भी छात्राओं ने छात्र संघ अध्यक्ष पद पर अभूतपूर्व सफलता दर्ज की है।

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यह परिणाम साफ तौर पर यह दिखाता है कि छात्र-छात्राओं ने संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर खुलकर योग्य महिला उम्मीदवारों को अपना पूरा समर्थन दिया है। दून विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. सुरेखा डंगवाल ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि विश्वविद्यालय जल्द ही एक कमेटी गठित करेगा जो यह तय करेगी कि छात्रसंघ चुनाव में रोटेशन बनाकर अध्यक्ष और सचिव पद को भी छात्राओं के लिए आरक्षित किया जाए।

उच्च शिक्षा के प्रभारी निदेशक डॉ. एसएन उनियाल ने कहा कि महाविद्यालयों में 70 प्रतिशत छात्राएं हैं और उन्हें उचित प्रतिनिधित्व मिलने से उनकी जो समस्याएं हैं, वे उन्हें ठीक से सामने रख सकेंगी। यह जीत केवल आंकड़ों और संख्याओं का खेल नहीं है, बल्कि यह छात्र राजनीति के पुराने एजेंडे को पूरी तरह बदलने का काम करेगी।

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परिसरों में महिला नेतृत्व के आने से अब परिसरों की सुरक्षा, लैंगिक समानता, छात्राओं की बुनियादी सुविधाओं और उनकी शैक्षणिक समस्याओं पर अधिक मुखरता से काम होने की पूरी उम्मीद है। इस बड़े बदलाव ने यह भी साबित कर दिया है कि यदि सही मंच और अवसर मिले, तो आज की युवा युवतियां हर क्षेत्र में नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार हैं।