कांग्रेस में गुटबाजी की पिक्चर जारी! न्याय यात्रा में भिड़े हरक और शर्मा समर्थक, जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारों से मचा घमासान

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देहरादून। देखती है जनता सब कुछ, पर वो फिर भी मौन है…जब सारे हैं जनरल यहां, तब सिपाही कौन है? कांग्रेस की अंदरूनी सियासत पर ये पंक्तियां सटीक बैठती नजर आ रही हैं। पार्टी भले ही सब कुछ ठीक होने का दावा करे, लेकिन सेलाकुई में कांग्रेस की न्याय यात्रा के दौरान जो नजारा देखने को मिला, उसने पार्टी की अंदरूनी खींचतान की तस्वीर एक बार फिर सामने ला दी।

न्याय यात्रा के दौरान कांग्रेस नेता आर्येंद्र शर्मा और हरक सिंह रावत के समर्थक आमने-सामने आ गए। देखते ही देखते जिंदाबाद और मुर्दाबाद के नारों के बीच माहौल गरमा गया। मंच पर ऐसा घमासान मचा कि वहां मौजूद कांग्रेस के पदाधिकारी भी सकते में आ गए। हालात संभालने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी और बड़ी मुश्किल से दोनों नेताओं के समर्थकों को काबू किया गया।

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न्याय यात्रा में न्याय कम, गुटबाजी का शोर ज्यादा!

जिस न्याय यात्रा के जरिए कांग्रेस को जनता के बीच अपनी राजनीतिक ताकत दिखानी थी, वहीं पार्टी के भीतर की खींचतान चर्चा का विषय बन गई। कार्यक्रम में समर्थकों के बीच हुई भिड़ंत ने कांग्रेस के एकजुटता के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर जब पार्टी के नेता और उनके समर्थक एक मंच पर साथ खड़े होने के बजाय आपस में ही उलझने लगें, तो जनता के बीच क्या संदेश जाएगा?

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो रही हैं। कांग्रेस के सामने सत्ता में आने की चुनौती है, लेकिन सेलाकुई की तस्वीर बता रही है कि पार्टी को बाहरी राजनीतिक मुकाबले से पहले अपने भीतर की चुनौतियों से भी जूझना पड़ सकता है।

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सारे जनरल बनेंगे तो सिपाही कौन होगा?

कांग्रेस की राजनीति में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। अलग-अलग नेताओं के समर्थकों के बीच वर्चस्व की लड़ाई अक्सर चर्चा में रहती है। लेकिन न्याय यात्रा जैसे राजनीतिक कार्यक्रम में इस तरह का हंगामा पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। सवाल यही है कि जब हर खेमे में अपने नेता का दबदबा दिखाने की होड़ होगी, तो संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?

ऑल इज वेल के दावों के बीच सिर फुटव्वल की सियासत!

कांग्रेस के सामने चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला करने की नहीं, बल्कि अपने नेताओं और समर्थकों को एकजुट रखने की भी है। सेलाकुई में हुई घटना ने एक बार फिर संकेत दिया है कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य होने के दावों के बावजूद खींचतान की चर्चाएं खत्म नहीं हुई हैं।

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अब देखना यह होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस घटनाक्रम को महज कार्यकर्ताओं का आपसी विवाद मानकर नजरअंदाज करता है या संगठनात्मक अनुशासन को लेकर कोई ठोस कदम उठाता है। फिलहाल सेलाकुई की न्याय यात्रा से निकला सियासी संदेश साफ है—जब अंदरूनी मोर्चे पर ही घमासान हो, तो चुनावी रण में एकजुटता की परीक्षा और भी कठिन हो जाएगी