देहरादून। कांग्रेस मुख्यालय में पूर्व विधायक और कांग्रेस की SIR कमेटी के अध्यक्ष मनोज रावत ने एक तीखी प्रेसवार्ता कर निर्वाचन आयोग की पूरी एसआईआर प्रक्रिया पर बेहद गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि 29 मई 2025 से शुरू हुई यह विशेष प्रक्रिया 3 अक्टूबर 2026 को समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके अंतिम आंकड़े आने अभी बाकी हैं। कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर अनियमिताओं को अंजाम दिया गया है, जिससे आम मतदाता सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा अधिकृत कांग्रेस की एसआईआर कमेटी ने प्रदेश की हर विधानसभा में अपने बीएलओ नियुक्त कर जमीनी स्तर पर निगरानी की थी। उन्होंने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सीधा हमला बोलते हुए दावा किया कि जुलाई महीने में एक ही व्यक्ति की ओर से उत्तराखंड में लगभग 6,500 लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए फॉर्म-7 भरे गए थे। उनके अनुसार, कुल 96 हजार से अधिक आपत्तियों में से केवल करीब 7 हजार आपत्तियां ही जांच में सही पाई गईं।
झबरेड़ा विधानसभा का उदाहरण देते हुए कांग्रेस नेता ने खुलासा किया कि जिन लोगों के नाम से आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं, उनमें से कई लोगों ने शपथपत्र देकर साफ किया कि उन्होंने ऐसी कोई आपत्ति कभी दर्ज ही नहीं कराई थी। इसके अलावा, उन्होंने आरोप लगाया कि हरिद्वार के एक क्षेत्र में करीब 3,503 ऑटो-जेनरेटेड फॉर्म के आधार पर धड़ल्ले से मतदाताओं के नाम काटे गए। उन्होंने कहा कि इस पूरी उठापटक में सबसे ज्यादा नुकसान गरीब, अशिक्षित और ऐसे लोगों को हुआ है, जिन्हें इस जटिल प्रक्रिया की बिल्कुल जानकारी नहीं थी।
कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने यह भी दावा किया कि एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने से करीब चार महीने पहले एक डुप्लीकेसी सॉफ्टवेयर के जरिए घर-घर जाकर चार लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए थे। रावत के मुताबिक, इस प्री-एसआईआर प्रक्रिया के बाद पूरे उत्तराखंड में कुल मिलाकर 13 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम काटे जा चुके हैं। उन्होंने आंकड़े रखते हुए बताया कि वर्तमान में राज्य में सर्विस वोटर्स की संख्या करीब 50 हजार है, जबकि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान कुल मतदाताओं का आंकड़ा 68 लाख से अधिक था।
एसआईआर की आवश्यकता पर सवाल खड़े करते हुए मनोज रावत ने दो टूक कहा कि कांग्रेस पार्टी का मानना है कि इस प्रक्रिया की कोई जरूरत ही नहीं थी। उन्होंने निर्वाचन आयोग की कार्यशैली की आलोचना करते हुए मांग की कि इस पूरी प्रक्रिया को तत्काल समाप्त किया जाए और इसमें हुए कथित अवैध कार्यों को देखते हुए पूरी प्रक्रिया को निरस्त घोषित किया जाए।
हालांकि, उन्होंने उत्तराखंड में निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े स्थानीय अधिकारियों और कर्मचारियों की सराहना करते हुए कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों ने कांग्रेस को पूरा सहयोग दिया, लेकिन इसके बावजूद भारत निर्वाचन आयोग की केंद्रीय भूमिका और कार्यप्रणाली पर खड़े किए गए सवाल कभी खत्म नहीं होते।

