देहरादून। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया सर्विसेज के अधिकारियों के तबादलों और पोस्टिंग में पिछले 12 वर्षों से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों व कैडर नियमों की कथित अनदेखी पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को कड़ा नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर अपना काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस कानूनी सख्ती का असर सीधे तौर पर राज्य की प्रशासनिक और नौकरशाही व्यवस्था पर पड़ना तय है।
यह जनहित याचिका बागेश्वर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक मंच के सदस्य पंकज पांडे द्वारा नैनीताल हाईकोर्ट में दायर की गई थी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभास उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष हुई। याचिका में मुख्य रूप से यह आरोप लगाया गया है कि उत्तराखंड में अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की तैनाती और तबादले तयशुदा कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं किए जा रहे हैं।
याचिकाकर्ता ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, सिविल सर्विसेज बोर्ड के अध्यक्ष, कार्मिक, गृह व वन विभागों के प्रमुख सचिवों को इस मामले में पक्षकार बनाया है। याचिका में रेखांकित किया गया है कि अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली के तहत संपत्तियों की जानकारी देना मात्र औपचारिकता बनकर रह गया है, जबकि सरकारों को अधिकारियों की चल-अचल संपत्तियों और उनके स्रोतों का विधिवत परीक्षण करने का पूरा अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए याचिका में बताया गया कि शीर्ष अदालत ने ‘सिविल सर्विसेज बोर्ड’ का गठन करने का स्पष्ट आदेश दिया था, ताकि अधिकारियों को न्यूनतम निश्चित कार्यकाल मिल सके। केंद्र सरकार ने जनवरी 2014 में कैडर नियमों में संशोधन कर अधिकारियों के लिए सामान्यतः कम से कम दो वर्ष के कार्यकाल का प्रावधान किया था। नियमों के तहत समय से पूर्व होने वाले तबादलों की तिमाही रिपोर्ट केंद्र को भेजना अनिवार्य है।
इसी बीच, हाईकोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर पद पर हुई नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए पूरी तरह रद्द कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभास उपाध्याय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के आरक्षित पद पर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी की संस्तुति और चयन उत्तराखंड लोक सेवा अधिनियम, 2019 के विरुद्ध था।

