किशाऊ बांध पर तकरार शुरू, हिमाचल और चकराता के ग्रामीण उतरे सड़क पर, हमारी मांग ढ़ग से सुनो !

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बेशक किशाऊ बांध पांच राज्यों की पानी-बिजली की किल्लत को दूर करने के लिए बनाया जा रहा हो लेकिन टोंस नदी पर बनने वाले भारी-भरकम बांध से हिमाचल और उत्तराखंड राज्य के गांव प्रभावित होंगें। अभी वे खेत-खलिहान वाले किसान है बांध बनने के बाद वे अपनी जड़ों से कट जाएगे । टिहरी बांध परियोजना के विस्थापितों की कई तकलीफों का समाधान आज तक नहीं हो पाया।

शायद यही देखते हुए किशाऊ बांध प्रभावित लामबंद हो गए हैं। किशाऊ बांध को लेकर उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान और दिल्ली सरकार के बीच समझौता हो चुका है। किसी राज्य के पानी मिलेगा तो किसी को बिजली लेकिन किशाऊ बांध परियोजना से प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि हमे क्या मिलेगा। लिहाजा उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के करीब 20 गांवों से पहुंचे ग्रामीणों ने हरिपुर –मिनस मोटरमार्ग पर चक्काजाम किया और किशाऊ बांध का विरोध किया। किसाऊ बांध परियजोना संघर्ष समिति के बैनर तले हुई महापंचायत और चक्का जाम में प्रभावित गांवो की मातृशक्ति ने भी बड़ी तादाद में हिस्सा लिया।

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ग्रामीणों का कहना है कि सरकार किशाऊ परियोजना के जरिए करीब 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई और बिजली उपलब्ध कराने का दावा कर रही है, लेकिन परियोजना से प्रभावित होने वाले परिवारों की जमीन, आजीविका और संभावित विस्थापन को लेकर उसका क्या सोचना है उस पर अभी तक कुछ भी स्थिति साफ नहीं है।

ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन को कई बार ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगें रखी गईं, लेकिन अब तक प्रभावित परिवारों के लिए स्पष्ट और पारदर्शी पुनर्वास नीति सामने नहीं आई है। ग्रामीणों ने परियोजना का नए सिरे से सर्वे कराने और प्रभावित परिवारों के हितों को ध्यान में रखते हुए पुनर्वास नीति तय करने की मांग उठाई है।

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ग्रामीणों ने साफ किया है कि जब तक उनकी मांगों पर सरकार और प्रशासन की ओर से स्पष्ट निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक किशाऊ परियोजना के खिलाफ उनका आंदोलन जारी रहेगा। बेशक सरकार की मंशा अवाम के लिए पानी-बिजली का पुख्ता इंतजाम करने की हो लेकिन उन ग्रामीणों की बात भी जायज है जिन्हे बांध बनने के बाद अपनी वो जमीन टोंस से बनने वाली झील में डबोनी होगी जिस पर अन्न उगाकर उनके पुरखों ने उन्हें पाला पोसा जवान किया।

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विस्थापन का दर्द क्या होता है ये एक प्रभावित परिवार ही जानता है। लिहाजा जरूरत है सरकार को इस मसले पर संजीदगी के साथ काम करने की ताकि अपनी जड़ो से उखड़ा ग्रामीण विस्थापित होकर सुकून से रह सके उसे अपने घर गांव खेत-खलिहान शमशान कभी याद न आएं।

विस्थापन के घाव पर पुनर्वास का मरहम शानदार होना चाहिए । ताकि बांध प्रभावित परिवारों को इस बात का मलाल न रहे कि उन्होंने अपने पुरखों का गांव छोड़ा है। विस्थापन की नीति- रीति प्रभावित परिवारों के हक में होनी चाहिए जिसे देख कर लगे कि ये उस लोककल्याणकारी सरकार ने बनाई है जिसे जनता ने अपने लिए वोट के जरिए चुना था।