देहरादून। उत्तराखंड के पर्यावरण और पर्वतीय अस्तित्व को लेकर एक बेहद चिंताजनक अध्ययन सामने आया है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की शोध रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन दशकों में प्रदेश के बर्फीले क्षेत्र में करीब 1640.82 वर्ग किलोमीटर की भारी गिरावट आई है। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘डिस्कवर एनवायरमेंट’ में प्रकाशित इस रिपोर्ट ने राज्य में प्राकृतिक आपदाओं, जल संकट और जैव विविधता पर मंडराते खतरे को उजागर कर दिया है।
वैज्ञानिकों ने वर्ष 2002 से 2025 के बीच प्रकाशित 177 शोध पत्रों का गहन अध्ययन करके यह निष्कर्ष जारी किया है। रिपोर्ट के अनुसार, 30 वर्षों में बर्फ से ढके इलाकों में 1640.82 वर्ग किमी और हरे-भरे वनस्पति आवरण में 584.24 वर्ग किमी की कमी हुई है। इसके विपरीत, इंसानी आबादी और कंक्रीट के निर्माण क्षेत्र में 485.69 वर्ग किलोमीटर की अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अध्ययन के आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि राज्य में खुले बंजर क्षेत्रों में 1671.25 वर्ग किमी का इजाफा हुआ है, जबकि कुल वन क्षेत्र में 42.32 वर्ग किमी की नाममात्र वृद्धि हुई है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि जंगलों का क्षेत्रफल भले थोड़ा बढ़ा हो, लेकिन उनकी गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। जंगलों के कटने और बस्तियों में बदलने से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास लगातार सिमट रहा है।
राजधानी देहरादून में अंधाधुंध निर्माण की स्थिति सबसे ज्यादा खतरनाक है। रिस्पना नदी बेसिन के अध्ययन से पता चला है कि पिछले 15 सालों में देहरादून का शहरीकरण 71 प्रतिशत तक बढ़ गया है। कृषि भूमि, जंगलों और खाली जमीनों के बस्तियों में तब्दील होने से बारिश के पानी की प्राकृतिक निकासी बंद हो गई है, जिससे शहर में हर साल बाढ़ और जलभराव का खतरा बढ़ रहा है।
शोध समीक्षा के मुताबिक, उत्तराखंड में भूमि उपयोग परिवर्तन पर हुए कुल अध्ययनों में से सबसे ज्यादा 44 अध्ययन अकेले देहरादून पर हुए हैं, जबकि टिहरी में 25 और नैनीताल में 22 शोध दर्ज किए गए हैं। वर्ष 2000 में अलग राज्य बनने के बाद देहरादून में अनियंत्रित शहरी विस्तार और पर्यटन गतिविधियों के चलते कृषि और हरित क्षेत्र बहुत तेजी से कंक्रीट के जंगलों में बदल गए।
इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने पारंपरिक तरीकों के बजाय सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग, जीआईएस और एआई आधारित मॉडलों से रियल-टाइम मॉनिटरिंग की सिफारिश की है। शोधकर्ताओं का कहना है कि मैदानी सर्वे और स्थानीय ग्रामीणों के फीडबैक को मिलाकर ही संवेदनशील वाटरशेड, भूस्खलन और बाढ़ वाले इलाकों की सही सुरक्षा की जा सकती है।

