उत्तराखंड MBBS फर्जी दाखिला: मेरठ से नेपाल तक फैला सिंडिकेट, SIT जांच में बड़ा खुलासा

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देहरादून। फर्जी प्रमाण पत्रों के जरिए एमबीबीएस दाखिले के बड़े फर्जीवाड़े में विशेष जांच टीम की पड़ताल जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, मेरठ से नेपाल तक फैले सिंडिकेट का भंडाफोड़ हो रहा है। एसआईटी की जांच में मेरठ से लेकर देहरादून के तहसील प्रशासन तक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। फर्जी दस्तावेज जारी होने की बात सामने आते ही तहसील स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों में हड़कंप मचा हुआ है।

जांच में खुलासा हुआ है कि गिरोह का मुख्य सरगना बिहार निवासी रूपेश पंडित मेरठ की द्वारिकापुरी कॉलोनी में पिछले पांच सालों से ‘मिकोडो पाठशाला’ नाम की फर्जी कंसल्टेंसी चला रहा था। इस कंसल्टेंसी की आड़ में वह देश के बड़े निजी विश्वविद्यालयों और विदेशों में एमबीबीएस, बीटेक, बीसीए और बीकॉम जैसे प्रोफेशनल कोर्सों में कमीशन लेकर दाखिले का खेल चला रहा था।

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एसआईटी के मुताबिक मामले में गिरफ्तार दूसरे आरोपी अरविंद और सरगना रूपेश की पहचान दो साल पुरानी है। अरविंद ने पहले अपने बेटे चिराग का एडमिशन भी रूपेश के जरिए ही नेपाल के मेडिकल कॉलेज में कराया था। इसके बाद आरोपी अरविंद ने अपनी बेटी परी और दो अन्य छात्राओं को उत्तराखंड के मेडिकल कॉलेजों में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे से सरकारी सीट दिलाने का बड़ा सौदा तय किया।

आरोपी रूपेश पंडित ने तीनों छात्राओं के परिजनों से ₹45-45 लाख में डील पक्की की और बतौर एडवांस ₹60 लाख ऐंठ लिए। बाकी रकम दाखिला प्रक्रिया पूरी होने के बाद दी जानी थी। मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आरोपी अरविंद की बेटी परी का स्थायी निवास प्रमाण पत्र पहले लक्सर तहसील से बना था, लेकिन बाद में फर्जी तरीके से देहरादून से निवास और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाण पत्र जारी करा दिया गया।

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इसी तरह मुजफ्फरनगर की निवासी छात्रा खुशी और उत्तराखंड की स्वाति के नाम से भी देहरादून के पते पर फर्जी दस्तावेज तैयार कराए गए थे।एसआईटी अब यह जांच कर रही है कि धरातलीय सत्यापन में किस स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत हुई और तहसील प्रशासन में किन-किन कर्मचारियों की भूमिका रही है।

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इस बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद अब पिछले वर्षों में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे से हुए पुराने मेडिकल दाखिलों की फाइलें दोबारा खोलने की मांग तेज हो गई है। गौरतलब है कि इस मामले की पहली शिकायत 3 सितंबर को मंत्री और जिलाधिकारी तक पहुंची थी, जिसके बाद 9 सितंबर को देहरादून प्रशासन ने विशेष जांच कमेटी का गठन किया था। एसआईटी की टीमें अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि यह सिंडिकेट केवल उत्तराखंड और यूपी तक सीमित है या दूसरे राज्यों के सरकारी तंत्र में भी सेंध लगा चुका है।