देहरादून। राजधानी देहरादून से पर्यावरण और ग्रीन एनर्जी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए फल-सब्जी मंडियों से निकलने वाले सड़े-गले कचरे से बायोगैस बनाने की कवायद शुरू कर दी गई है। नेशनल काउंसिल ऑफ स्टेट एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड की ओर से किच्छा और विकासनगर में कंप्रेस्ड बायोगैस प्लांट स्थापित करने के लिए डीपीआर तैयार की जा रही है। इस महत्वपूर्ण पहल से मंडियों के कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण हो सकेगा और स्थानीय स्तर पर क्लीन एनर्जी का उत्पादन भी होगा।
वर्तमान में प्रदेशभर में कुल 25 फल व सब्जी मंडियां संचालित हो रही हैं, जिनसे रोजाना लगभग 240 टन कचरा एकत्र होता है। अभी तक मंडियों का यह सारा कचरा पारंपरिक रूप से कूड़ा डंपिंग जोन में भेजा जाता था। इस नई योजना के तहत कचरे से तैयार होने वाली बायोगैस को गेल कंपनी द्वारा 105 रुपये प्रति किलोग्राम तक की दर से खरीदा जाएगा।
गुजरात के अहमदाबाद मॉडल की तर्ज पर नेशनल काउंसिल ऑफ स्टेट एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड उत्तराखंड में यह बायोगैस प्लांट लगाने जा रहा है। वर्ष 2018 में अहमदाबाद में स्थापित प्लांट की सफलता के बाद अब उत्तराखंड के किच्छा और विकासनगर मंडी में डीपीआर तैयार की जा रही है। यहां उत्पादित बायोगैस की खरीद सीधे गेल कंपनी के माध्यम से की जाएगी।
नेशनल काउंसिल ऑफ स्टेट एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड के प्रबंध निदेशक जेएस यादव ने बताया कि इस प्रोजेक्ट से मंडियों से रोजाना निकलने वाले सैकड़ों टन कचरे का स्थाई समाधान निकलेगा। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि उत्तराखंड के अलावा बेंगलुरु, हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब और हरियाणा के पटियाला में भी बायोगैस प्लांट लगाने की योजना पर काम चल रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक, 100 टन क्षमता के एक बायोगैस प्लांट की स्थापना लागत लगभग 30 करोड़ रुपये तक आती है और इसके लिए कई निवेशक आगे आ रहे हैं। उत्तराखंड कृषि उपज एवं विपणन बोर्ड के डीजीएम विजय थपलियाल ने कहा कि मंडियों के कचरे का निस्तारण एक बड़ी चुनौती रहा है। नेशनल काउंसिल से बायोगैस प्लांट की डीपीआर प्राप्त होते ही इसे अंतिम अनुमोदन के लिए बोर्ड के समक्ष रखा जाएगा।

