श्री बदरीनाथ धाम- जहां शंख नहीं बजाया जाता वहां डीजे बजा दिया, यह तीर्थ है कोई Goa Beach नहीं..

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देहरादून। उत्तराखंड देवभूमि है इसमे कोई इफ और बट नहीं है..यहां सबका सम्मान है..यहां भागवान शिव केदारधाम में समाधिस्थ है तो भगवान विष्णु श्रीबदरीनाथ में ध्यानमग्न देश के एक बड़े हिस्से की भूख-प्यास बुझाने वाली मां गंगा-यमुना का यहां मायका है..आस्थावानों के लिए यहां कण-कण में ईश्वर विराजमान हैं। लेकिन मौजूदा वक्त में तपोभूमि मानी जाने वाली देवभूमि को पर्यटन स्थली पेश किया जा रहा है।

सारी मर्यादाएं परंपराए ताक पर हैं कोई रोक टोक नहीं, जो दानिशमंद हैं उनकी सलाह हाशिए पर है और देवभूमि उत्तराखंड के तीर्थस्थल पर्यटन केंद्र बनाकर सैलानियों के कदमो तले बिछा दिए गए हैं। कहते हैं जब यातायाता के साधन नहीं थे तब उत्तराखंड की चारधाम यात्रा पैदल की जाती थी..आज भी यात्रा रूटों पर जिन जगहों को चट्टी पुकारा जाता है वो चट्टियां चारधाम पैदल यात्रा के विश्राम पड़ाव थे।

जहां तीर्थयात्री विश्राम करता था.हरि का नाम सुमिरन करते हुए रात बिताता था और भोर होते ही चारधाम यात्रा के अगले पड़ाव के सफर के लिए निकल पड़ता था। मतलब पैदल यात्रा के दौर में चारधाम यात्रा का सफर कठिन था लिहाजा मुश्किल होता था। लोग अपनी घर-परिवार की जिम्मेदारियां निभा कर वानप्रस्थ या सन्यास आश्रम की उम्र में चारधाम यात्रा पर निकलते थे। चारधाम यात्रा का अर्थ ही तपस्या था।

जैसे ऋषि-मुनि तपस्य़ा के पश्चात ईश्वर की प्राप्ति करते थे ठीक वैसे ही गृहस्थी ईश्वर दर्शन की अभिलाषा से चारधाम यात्रा की कठिन राह पर निकलता था और पैदल चलते हुए तपस्या करता था और धाम पहुंचकर ईश्वर के दर्शन। बिल्कुल शांति के साथ अथाह विश्वास के साथ ईश्वर के धाम में प्रभु से साक्षात्कार। बर्फीले हिमालय की गोद में मौजूद इन चारधामों का अपना महात्मय है।

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पुराने लोग बताते हैं पैदल यात्रा के दौर में जब कोई तीर्थयात्री चार धाम यात्रा पूरी कर वापस लौटता था तो उसे सौभाग्याशाली माना जाता था। पूरा गांव उसका स्वागत करता था उसके सुरक्षित वापस लौटने की खुशी मनाई जाती थी धार्मिक अनुष्ठान किया जाता था और गांव के लोग उस तीर्थयात्री की परिक्रमा करते थे उसके चरण स्पर्श करते थे। उसका भाव होता था कि चारधाम यात्रा पूरी कर गांव लौटे मनुष्य ने समाधिस्थ भगवान विष्णु और शंकर के दर्शन किए हैं हम इनके पांव छुएंगे तो उस ईश्वर को हमारा प्रणाम स्वीकार होगा।

उस दौर की जो मान्यताएं थी वो पर्यटन प्रदेश उत्तराखंड में समाप्त हो गई हैं। पहलें उम्र के एक पड़ाव के बाद तीर्थयात्राएं की जाती थी अब रास्ता सहज सुगम हुआ तो दुधमुहें बच्चे को भी चारधाम यात्रा करवाई जा रही है। जिस केदारधाम में भगवान शंकर समाधिस्थ है, बड़े लोगों ने केदारधाम पहुंचकर गर्भगृह में अपनी पूजाअर्चना करते हुए वीडियो बनावा दिए जिस गर्भग्रह को देखने का अधिकार सिर्फ उस भक्त को था जो पैदल साधना कर समाधिस्थ ईश्वर के लिंगरूप दर्शन को पहुंचा है।

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उस गर्भगृह को अब सोशल मीडिया के जरिए सार्वजनिक कर दिया। जिस बदरीधाम की मान्यता है कि उसे भगवान विष्णु ने तपस्या के लिए चुना और पति को तपस्या में लीन देख मां लक्ष्मी ने बदरी वृक्ष का रुप धारण कर उन्हें छाया प्रदान की। उस बदरीनाथ धाम मे पूजा आरती के दौरान भी शंख नहीं बजाए जाने का मान्यता है माना जाता है कि शंख बजाने से भगवान की समाधि उनकी तपस्य़ा भंग हो जाएगी वहां नए जमाने के भक्तों ने हर मान्यता को तार-तार कर दिया है।

सरिया सीमेंट कंकरीट के भारी-भरकम इमारतों का बोझ ऩए जमाने में श्रीबदरीनाथ धाम की गोद में रखा जा रहा है। बदरीनाथ के प्रांगण में हजारो की तादाद मे भक्त इकट्ठे होते हैं और डीजे के बेहूदा शोर पर थिरकते हैं। धमाल मचाते हैं उन्हे इस देवभूमि की मान्यताओं से कोई संवदेना नहीं उन्हे बस थिरकना है अपना उत्साह व्यक्त करना है डीपी के लिए अपना थिरकता हुआ वीडियो शूट करना है।

तीर्थस्थल को पर्यटन स्थल और लुत्फ का अड्डा बनाने वाले नए दौर के टूरिस्ट देवभूमि की मान्यताओं की बखिया उधेड़ रहे हैं। सब देख रहे हैं मगर खामोश है न जाने क्यों न उन्हें सौम्य हिमालय के मिजाज की परवाह है न उन समाधिस्थ देवताओं से जुड़ी मान्यताओं की. उन्हें बस अपने सुकून के लिए आंकड़े चाहिए। न हिमालय से सरोकार न देवताओं से न उसकी मान्यताओं से।

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सीधा सवाल है जब मान्यता है तभी देवभूमि है वरना पहाड़ तो मेघालय में भी है ,कर्नाटक में भी और झारखंड समेत दूसरे कई राज्यों में भी बस देवभूमि उत्तराखंड ही है। यानि मान्यताओँ ने पहाड़ और मंदिरो वाली जमीन को तपोभूमि उत्तराखंड बनाया है..लेकिन इस दौर में हम सबने उन्ही मान्यताओं को झुठला दिया है।

हम शायद भूल रहे हैं कि श्री बदरीनाथ धाम केवल एक स्थान नहीं है यह एक आध्यात्मिक अनुभव है। सदियों से इसे साधना, ध्यान, योग, तप और आध्यात्मिक शांति की भूमि के रूप में देखा जाता रहा है। जिसके चारों ओर हिमालय है । जहां प्रकृति की अपनी एक अलग आभा है ।

ऊंचे पहाड़, अलकनंदा की धारा, ठंडी हवा और मंदिर की घंटियों के बीच पैदा होने वाला वातावरण ही इस धाम की विशिष्टता है । यह शोर शराबे के साथ कला संस्कृति को पेश करने का मंच नहीं है। यह शहर गांव में हो सकता है होना भी चाहिए लेकिन उस बर्फीले हिमालय में नहीं जहां किसी तपस्थली है और जहां की शांति में महसूस करने वालों को ही ईश्वर का आहसास होता है। सावधान! ये हिमालय है छेडछाड़ बर्दाश्त नहीं करेगा।