देहरादून। शराब तस्करी से शुरू हुआ खेल विवादित व्यापारी की श्रेणी तक पहुंचा कारोबार और अब सोशल मीडिया की दहलीज पर भी पहुंच गया है जिसका कोई ना कोई प्रमाण है और ना ही कोई विश्वसनीयता, बस जो मन में आया वह लिख दिया और पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा कर दिया।। पूछने वाला कोई है नहीं तो फिर भ्रामक खबर बनाएं या फिर किसी की छवि धूमिल करो क्या फर्क पड़ता है ? उत्तराखंड में शराब कारोबार को लेकर इन दिनों एक अलग ही खेल दिखाई देने लगा है। लंबे समय से शराब के कारोबार से जुड़ा एक कथित कारोबारी जब नियम-कायदों के सख्त होने और विभागीय कार्रवाई की जद में आया तो अब मामला कार्रवाई से निकलकर सोशल मीडिया के मैदान तक पहुंचा दिया । अब एक कथित इंटरव्यू के जरिए सवाल उठाए जा रहे हैं तो कहीं सोशल मीडिया पोस्ट और कथित खबरों के जरिए विभागीय कार्रवाई पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। जबकि सूत्र बताते है कि पूर्व में भी विवादित व्यापारी जिला देहरादून में आबकारी टीम कार्रवाई में जिसमें बड़ी महिला अफसर भी शामिल थी के साथ अपनी शराब की दुकान पर मारपीट और आगजनी जैसी घटना को अंजाम दे चुका है ,जिसमे इस विवादित कारोबारी के ख़िलाफ़ न्यायालय वाद चल रहा है।
सवाल सीधा है—अगर कार्रवाई नियमों के तहत हुई है तो फिर इतनी बेचैनी क्यों?
शराब कारोबारी की ओर से ओवररेटिंग समेत कई आरोप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगाए जा रहे हैं। यह अलग बात है कि किसी भी आरोप की असली तस्वीर जांच और उपलब्ध दस्तावेजों से ही सामने आ सकती है। लेकिन सोशल मीडिया के इस दौर में बिना पर्याप्त प्रमाण के आरोप लगाना और उन्हें खबर की शक्ल में वायरल कर देना अब एक नई चुनौती बनता जा रहा है। खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के इस्तेमाल ने इस खेल को और आसान कर दिया है। कुछ ही मिनटों में खबर तैयार, आकर्षक हेडलाइन तैयार और फिर सोशल मीडिया पर पोस्ट। न स्रोत का स्पष्ट उल्लेख, न दस्तावेज का हवाला और न ही संबंधित पक्ष का पूरा पक्ष। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर खबर और आरोप के बीच की रेखा कहां गायब हो गई?हालांकि किसी भी कारोबारी या विभाग के खिलाफ लगाए गए आरोपों को केवल सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर सही या गलत नहीं माना जा सकता। आरोपों की पुष्टि के लिए विभागीय रिकॉर्ड, निरीक्षण रिपोर्ट, चालान, लाइसेंस शर्तें और अन्य प्रमाण सामने आना जरूरी है।
दरअसल शराब कारोबार ऐसा क्षेत्र है जहां लाइसेंस से लेकर बिक्री तक तमाम नियम लागू होते हैं। यदि किसी कारोबारी पर नियम उल्लंघन का आरोप है तो उसे अपना पक्ष रखने और वैधानिक प्रक्रिया के तहत चुनौती देने का अधिकार है। जबकि कोर्ट ने भी पूर्व में विभाग द्वारा की गई कार्रवाई को सही मानते हुए विभाग के पक्ष में फ़ैसला सुना चुका है। ऐसे में जब बौखलाहट बड़ी तो फर्जी आरोपों के लिए भी विभाग को तैयार रहना होगा।।
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल सोशल मीडिया की विश्वसनीयता का है। आज कोई भी व्यक्ति मोबाइल उठाकर किसी के नाम, पद या विभाग पर गंभीर आरोप लगा सकता है। पोस्ट कुछ ही मिनटों में चंद लोगों तक पहुंच जाती है, लेकिन उसकी सत्यता की जांच कौन करेगा? यही वह सवाल है जिस पर गंभीर मंथन की जरूरत है।
चुनाव नजदीक आने के साथ राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दों को लेकर सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप बढ़ना भी स्वाभाविक है, लेकिन किसी भी कारोबारी विवाद को राजनीतिक रंग देने से पहले तथ्य सामने आना जरूरी है। अब देखना यह होगा कि विवादित शराब कारोबारी के कथित क्योंकि आखिर सवाल सिर्फ एक कारोबारी या एक विभाग का नहीं है—सवाल उस व्यवस्था की विश्वसनीयता का है, जिसमें कार्रवाई भी नियम से हो और आरोप भी प्रमाण के साथ सामने आएं। फिलहाल सोशल मीडिया पर चल रहा दबाव का खेल अपने चरम पर जरूर पहुंच गया है। विभाग की छवि धूमिल करने वाले विवादित कारोबारियों पर अब विभाग कार्रवाई क्यों ना करें ?

