बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्वागत के लिए घंटों पहले किया मार्ग बंद….जनता परेशान….कोई तो ढूंढो समाधान..

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देहरादून। राजनीति में अक्सर यह कहा जाता है कि जनता ही सबसे ऊपर होती है, लेकिन उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रस्तावित दौरे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में आम जनता बची भी है या नहीं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का कार्यक्रम भले ही शाम साढ़े पांच बजे भाजपा प्रदेश कार्यालय, बलबीर रोड पहुंचने का तय हो, लेकिन उससे करीब तीन घंटे पहले ही सड़क पर ऐसा “सुरक्षा और स्वागत तंत्र” लागू कर दिया गया कि स्थानीय लोगों की दिनचर्या पूरी तरह प्रभावित हो गई।

चिलचिलाती धूप, ऊपर से नौतपा की तपिश और मौसम विभाग की गर्मी को लेकर चेतावनी… इन सबके बीच इलाके में रहने वाले लोग सड़क बंद होने के कारण परेशान होते रहे। किसी को घर पहुंचने में दिक्कत हुई तो किसी को अपने छोटे बच्चों और बुजुर्गों के साथ धूप में वैकल्पिक मार्ग ढूंढने को मजबूर होना पड़ा। लेकिन लगता है कि संगठन के उत्साह के आगे आम जनता की परेशानी का कोई महत्व नहीं बचा।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई पहली बार नहीं है जब भाजपा प्रदेश कार्यालय के आसपास रहने वाले लोगों को इस तरह की परेशानी झेलनी पड़ी हो। इससे पहले भी जब-जब बड़े नेताओं के कार्यक्रम हुए, सड़कें बंद कर दी गईं और आम लोगों को घंटों इधर-उधर भटकना पड़ा। फर्क सिर्फ इतना है कि हर बार नेताओं के स्वागत के नाम पर जनता को “असुविधा पैकेज” मुफ्त में मिल जाता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कार्यक्रम शाम साढ़े पांच बजे है, तो आखिर तीन घंटे पहले सड़क बंद करने की क्या जरूरत थी ? क्या यह सुरक्षा व्यवस्था थी या फिर नेताओं को खुश करने की प्रतियोगिता? राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बड़े नेताओं की नजर में “सक्रिय कार्यकर्ता” दिखने की होड़ में संगठन के पदाधिकारी अक्सर ऐसे कदम उठा देते हैं, जिनका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है।

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विडंबना यह भी है कि जनता से जुड़ाव और सुशासन का दावा करने वाली पार्टी के कार्यक्रमों में सबसे ज्यादा परेशानी जनता को ही झेलनी पड़ रही है। सड़कें बंद, बैरिकेडिंग, वाहनों की लंबी कतारें और पुलिस की सख्ती… यह सब अब राजधानी में किसी भी बड़े राजनीतिक कार्यक्रम का स्थायी दृश्य बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक कार्यक्रमों का मतलब आम लोगों की आवाजाही रोक देना है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क बंद होने का असर सब पर पड़ता है। इलाके में रहने वाले लोगों का कहना है कि उन्हें ऐसा महसूस होने लगा है जैसे वे किसी राजनीतिक कार्यालय के आसपास नहीं, बल्कि किसी “वीआईपी जोन” में रह रहे हों, जहां आम आदमी की सुविधा सबसे आखिरी प्राथमिकता है।

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राजनीतिक दल अक्सर जनता के बीच जाकर सेवा और समर्पण की बातें करते हैं, लेकिन जब उन्हीं कार्यक्रमों की वजह से जनता को घंटों धूप में परेशान होना पड़े, तो सवाल उठना लाजिमी है। आखिर लोकतंत्र में व्यवस्था जनता के लिए है या जनता को व्यवस्था के लिए परेशान होना पड़ेगा?

फिलहाल भाजपा नेताओं के स्वागत की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं, लेकिन बलबीर रोड के आसपास रहने वाले लोग यही कह रहे हैं कि नेताओं का स्वागत अपनी जगह ठीक है, मगर जनता को परेशान करके होने वाला स्वागत आखिर किस काम का?