उत्तराखंड में वनाग्नि पर 5 साल की कार्ययोजना ठप, विंटर फायर से निपटने का भी नहीं कोई ठोस प्लान

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उत्तराखंड के जंगलों में हर साल धधकने वाली आग के कारण सैकड़ों हेक्टेयर वन संपदा खाक हो रही है, लेकिन इससे निपटने के लिए बनाई गई पांच साल की विस्तृत कार्ययोजना पर अब तक काम शुरू नहीं हो सका है। वर्ष 2024 में बिनसर अभयारण्य सहित अन्य जगहों पर लगी भीषण आग में कई वन कर्मियों और लोगों की मौत के बाद वन विभाग ने एक व्यापक रणनीति तैयार की थी।

इस योजना में आग लगने से पहले की तैयारी, वनाग्नि के समय उठाए जाने वाले कदम, प्रभावित क्षेत्रों में दोबारा हरियाली लाने और आग के मूल कारणों का अध्ययन करने जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया गया था। इस कार्ययोजना को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को भेजकर चार सौ करोड़ रुपये के बजट की मांग भी की गई थी, लेकिन कई साल बीत जाने के बाद भी यह प्रस्ताव धरातल पर नहीं उतर पाया है।

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दो दिनों में वनाग्नि की 54 नई घटनाएं

प्रदेश में जंगल की आग बेकाबू होती जा रही है और पिछले महज दो दिनों के भीतर वनाग्नि की 54 नई घटनाएं दर्ज की गई हैं। आंकड़ों के अनुसार, 25 मई तक राज्य में जंगल की आग की 394 घटनाएं रिपोर्ट हुई थीं, जो अब बढ़कर 448 तक पहुंच चुकी हैं। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान गढ़वाल रीजन में हुआ है जहां 329 घटनाएं सामने आईं, जबकि कुमाऊं में 83 और वन्यजीव क्षेत्रों में 36 घटनाएं दर्ज की गई हैं।

इन हादसों में अब तक 370 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र को भारी क्षति पहुंची है और आग की चपेट में आने से दो लोगों की दुखद मौत भी हो चुकी है। पूर्व मुख्य वन संरक्षक एस.के. सिंह का मानना है कि इस समस्या के स्थाई समाधान के लिए आग लगने के मूल कारणों को जानकर उसी के अनुरूप ठोस कदम उठाने होंगे।

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विंटर फायर बनी वन विभाग के लिए नई चुनौती

आमतौर पर वन विभाग गर्मियों के मौसम को ही ‘फायर सीजन’ मानकर 15 फरवरी से 15 जून तक तैयारियां करता है, जिसमें कंट्रोल बर्निंग और फायर वॉचरों की तैनाती शामिल होती है। लेकिन पिछले कुछ समय से कम बारिश और बर्फबारी के कारण सर्दियों के महीनों में भी जंगलों का धधकना एक बड़ी चुनौती बन गया है, जिससे निपटने का विभाग के पास कोई प्लान नहीं है।

पिछले साल नवंबर से 15 फरवरी के बीच ही सर्दियों में वनाग्नि की 61 घटनाएं सामने आई थीं, जिसमें 42 हेक्टेयर जंगल और 2 हेक्टेयर पौधारोपण क्षेत्र नष्ट हो गया था। नंदा देवी बायोस्फीयर जैसी ऊंची पहाड़ियों तक पहुंचने वाली सर्दियों की यह आग मानसून आने पर ही प्राकृतिक रूप से शांत हो पाती है, जिसके बाद वन विभाग का ध्यान इस ओर से पूरी तरह हट जाता है।

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केंद्र सरकार से जल्द आर्थिक मदद की गुहार

संकट की इस स्थिति में वनाग्नि पर प्रभावी नियंत्रण पाने के लिए वन विभाग अब केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता की उम्मीद कर रहा है। प्रमुख वन संरक्षक रंजन मिश्रा के अनुसार, वनाग्नि की गंभीरता को देखते हुए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को तत्काल आर्थिक सहायता के लिए पत्र भेजा जा रहा है।

इसके साथ ही कैम्पा मद से भी आवश्यक धनराशि जारी करने का अनुरोध किया जाएगा ताकि बजट मिलते ही पांच साल की रुकी हुई कार्ययोजना पर आगे बढ़ा जा सके। वहीं मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक ने आश्वासन दिया है कि अब सर्दियों में लगने वाली आग को रोकने के लिए भी एक अलग से विशेष प्लान बनाकर कार्य किया जाएगा और इस पूरी मुहिम में अन्य सरकारी विभागों का भी सहयोग लिया जा रहा है।

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