उत्तराखंड सरकार ने राज्य के बहुमूल्य जंगलों को भीषण वनाग्नि से सुरक्षित रखने के लिए एक नई और प्रेरणादायक पहल की शुरुआत की है, जिसके तहत जंगलों की आग बुझाने में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले लोगों और समूहों को पुरस्कृत किया जाएगा। देहरादून में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान प्रदेश के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस योजना की आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि वनाग्नि नियंत्रण के प्रयासों को गति देने के लिए वन महकमा सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर सम्मानित करेगा।
इस विशेष प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत तीन वन कर्मियों को भी विशेष रूप से पुरस्कृत किया जाएगा, जिसमें प्रथम पुरस्कार के रूप में एक लाख रुपये, द्वितीय पुरस्कार के तहत 75 हजार रुपये और तृतीय पुरस्कार के रूप में 50 हजार रुपये की सम्मान राशि प्रदान की जाएगी। इस पुरस्कार कार्यक्रम का आयोजन हर जिले में फायर सीजन की समाप्ति के बाद सफलता पूर्वक संपन्न किया जाएगा।
वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि जंगलों की आग जैसी गंभीर प्राकृतिक आपदा पर केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि व्यापक जनसहभागिता के जरिए ही पूरी तरह नियंत्रण पाया जा सकता है। सरकार अब वनाग्नि को रोकने के लिए पारंपरिक और सफल सामुदायिक तौर-तरीकों को पूरे प्रदेश में लागू करने की योजना बना रही है, जिसके तहत पूर्व में सफल रहे शीतलाखेत मॉडल के साथ-साथ पर्यावरणविद् विजय जड़धारी द्वारा विकसित ‘जड़धारी मॉडल’ को भी अपनाया जाएगा। इसके अलावा, राज्य के 41 वन प्रभागों में मॉक ड्रिल और जागरूकता अभियानों के माध्यम से स्थानीय ग्रामीणों को मुस्तैद किया जा रहा है, ताकि नई तकनीकों और जनशक्ति के तालमेल से जंगलों को खाक होने से बचाया जा सके।
वास्तविक कारणों को खोजने की नसीहत
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वन मंत्री ने जनता और युवाओं को एक बेहद महत्वपूर्ण नसीहत देते हुए कहा कि जंगल में आग लगने की घटना के समय सोशल मीडिया के लिए रील्स या वीडियो बनाने में समय गंवाने से बेहतर होगा कि लोग आग पर नियंत्रण पाने में वन विभाग की टीम का सक्रिय सहयोग करें।
उन्होंने वनाग्नि के वास्तविक कारणों का पता लगाने की आवश्यकता पर भी बल दिया और एक चौंकाने वाला तथ्य साझा करते हुए बताया कि भारतीय वन सर्वेक्षण की ओर से आने वाले फायर अलर्ट्स में से केवल 14 प्रतिशत अलर्ट ही वास्तव में जंगल की आग से जुड़े होते हैं। प्रमुख वन संरक्षक रंजन मिश्रा और मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक की मौजूदगी में हुई इस वार्ता में स्पष्ट किया गया कि तकनीकी सुधारों और जमीनी सच को समझकर ही इस संकट का स्थाई समाधान खोजा जा सकता है।

