“मौत के बाद भी मिलती रही पेंशन!”2015 से 2018 के बीच हुआ बड़ा खेल, कैग की रिपोर्ट में हुआ खुलासा….

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देहरादून। उत्तराखंड का समाज कल्याण विभाग अपने “अद्भुत कल्याणकारी मॉडल” को लेकर चर्चा में है। यह मॉडल इतना अनोखा निकला कि यहां मौत भी सरकारी फाइलों के आगे बेबस दिखाई दी। जिन लोगों का इस दुनिया से रिश्ता खत्म हो चुका था, सरकारी रिकॉर्ड में वे वर्षों तक “जिंदा” बने रहे और उनके खातों में पेंशन पहुंचती रही। मामला तब और दिलचस्प हो गया जब मृतकों के खातों से पैसा भी निकलता रहा, लेकिन विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखाकार यानी CAG की रिपोर्ट ने उत्तराखंड सरकार और समाज कल्याण विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में सामने आया कि वर्ष 2015 से 2018 के बीच विभाग में ऐसी वित्तीय अनियमितताएं हुईं, जिन्होंने सरकारी सिस्टम की पोल खोलकर रख दी।

आमतौर पर समाज कल्याण विभाग का काम गरीबों, बुजुर्गों, विधवाओं और जरूरतमंदों को राहत देना होता है, लेकिन उत्तराखंड में यह विभाग “परलोक कल्याण विभाग” की तरह काम करता दिखाई दिया। रिपोर्ट के अनुसार 74 मृत पेंशनरों के खातों में लगातार 6 साल 6 महीने तक पेंशन भेजी जाती रही। यानी व्यक्ति दुनिया छोड़ चुका था, लेकिन सरकारी सिस्टम में उसकी मौजूदगी इतनी मजबूत थी कि हर महीने सम्मानपूर्वक पेंशन उसके खाते में पहुंच रही थी।

सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि इन खातों से पैसे निकाले भी जाते रहे। अब सवाल यह है कि आखिर यह पैसा कौन निकाल रहा था? विभाग क्या कर रहा था? और इतनी लंबी अवधि तक किसी अधिकारी को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? ऐसा लग रहा था मानो विभाग ने “मृतक सम्मान पेंशन योजना” चुपचाप लागू कर दी हो। कैग रिपोर्ट के मुताबिक इन गड़बड़ियों के कारण सरकारी खजाने को करीब 87 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

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वहीं लगभग 5 करोड़ रुपये ऐसे मामलों में बहा दिए गए, जहां नियमों का पालन ही नहीं हुआ। रिपोर्ट बताती है कि विभाग में निगरानी और सत्यापन की प्रक्रिया इतनी कमजोर थी कि कई अपात्र लोगों को भी पेंशनधारी बना दिया गया। इतना ही नहीं, 2015 से 2018 के बीच 11 हजार से ज्यादा पेंशनधारकों को तय सीमा से अधिक पेंशन दी गई।

वहीं कई वास्तविक लाभार्थियों को कम राशि मिली। यानी विभाग का हिसाब-किताब ऐसा था कि किसी को जरूरत से ज्यादा “सरकारी कृपा” मिल रही थी और कोई वास्तविक पात्र व्यक्ति अपने हिस्से की पूरी सहायता के लिए तरस रहा था।

सरकारी योजनाओं में आमतौर पर आधार सत्यापन, मृत्यु प्रमाण पत्र और समय-समय पर रिकॉर्ड अपडेट करने की व्यवस्था होती है, लेकिन समाज कल्याण विभाग में मानो ये सारे नियम सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए बने हों। कैग की रिपोर्ट यह साफ दिखाती है कि विभागीय स्तर पर निगरानी लगभग नाममात्र की रह गई थी।

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प्रदेश की राजनीति में भी इस रिपोर्ट ने भूचाल ला दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री ने रिपोर्ट सामने आने के बाद कहा कि यदि किसी ने जानबूझकर वित्तीय अनियमितताएं की हैं तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मामले की गंभीरता से जांच कराई जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

हालांकि विपक्ष को सरकार को घेरने का बड़ा मौका मिल गया है। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा सरकार भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने में पूरी तरह नाकाम रही है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि सरकार लगातार “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” का नारा देती रही, लेकिन हकीकत में विभागों के भीतर वित्तीय गड़बड़ियां बेरोकटोक चलती रहीं।

प्रदेश कांग्रेस के नेता सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि समय रहते लोकायुक्त की नियुक्ति की जाती तो ऐसी नौबत नहीं आती। उनका कहना है कि कांग्रेस लगातार लोकायुक्त लागू करने की मांग करती रही, लेकिन सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अब कैग रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि वित्तीय प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था कितनी कमजोर हो चुकी है।

राजनीतिक गलियारों में अब इस बात को लेकर भी चर्चा है कि आखिर इतने बड़े स्तर पर हुई अनियमितताओं की जिम्मेदारी किसकी तय होगी। क्या केवल छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी या फिर उन अधिकारियों तक भी जांच पहुंचेगी जिनकी निगरानी में यह पूरा खेल चलता रहा?

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लोग सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर तंज कस रहे हैं। कोई कह रहा है कि “उत्तराखंड में मौत के बाद भी सरकारी सुविधाएं बंद नहीं होतीं”, तो कोई लिख रहा है कि “यहां इंसान मर सकता है, लेकिन उसकी पेंशन फाइल अमर रहती है।”

दरअसल यह मामला सिर्फ वित्तीय अनियमितता का नहीं बल्कि सरकारी सिस्टम की गंभीर लापरवाही का आईना भी है। जिन योजनाओं का उद्देश्य जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाना था, वहीं योजनाएं भ्रष्ट व्यवस्था और कमजोर निगरानी की भेंट चढ़ती दिखाई दीं।

अब सबकी नजर सरकार की अगली कार्रवाई पर है। क्योंकि सवाल सिर्फ 87 करोड़ रुपये का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जिसमें मौत के बाद भी सरकारी पैसा वर्षों तक बहता रहा और किसी को पता तक नहीं चला। हालांकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहले ही इस बात को स्पष्ट कर चुके हैं कि घोटाले लापरवाही किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे अब यह मामले फिर से विपक्ष की जुबान पर आ रहे हैं तो जायसी बात है कार्रवाई का जिन भी बाहर निकलना तय है।।

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