देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड में आगामी कुंभ को भव्य और दिव्य बनाने के लिए सरकार जहां पूरी ताकत के साथ तैयारियों में जुटी है, वहीं दूसरी ओर इस महापर्व की आड़ में कथित तौर पर टेंडरों को लेकर खेल शुरू होने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। मामला एक पूर्व वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट और उसके करीबी माने जाने वाले एक शख्स से जुड़ा बताया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, यह जोड़ी इन दिनों काफी सक्रिय बताई जा रही है और बड़े टेंडरों को अपने पक्ष में करने के लिए दबाव की रणनीति अपनाने के आरोप लग रहे हैं। चर्चा है कि संबंधित पूर्व अधिकारी, जो अपने कार्यकाल के दौरान भी खूब सुर्खियों में रहा है, अब अपने प्रभाव और पुराने संपर्कों का इस्तेमाल कर रहा है। चर्चा है कि कुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजन को लेकर राज्य सरकार ने पहले ही ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों को साफ तौर पर कहा गया है कि व्यवस्थाएं पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से संचालित हों, ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता की गुंजाइश न रहे। इसके बावजूद, टेंडर प्रक्रिया में हस्तक्षेप और दबाव बनाने की खबरें प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। बताया जा रहा है कि एक व्यक्ति अलग-अलग विभागों के अधिकारियों से संपर्क साधकर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। कभी वह अधिकारियों के दफ्तरों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है, तो कभी कथित तौर पर भ्रामक जानकारी देकर यह जताने की कोशिश करता है कि उसके पीछे एक प्रभावशाली नेटवर्क काम कर रहा है। सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि इस पूरी कवायद का मकसद किसी भी तरह से महत्वपूर्ण टेंडरों को एक खास कंपनी के पक्ष में दिलाना है, जो कथित तौर पर उसी पूर्व ब्यूरोक्रेट से जुड़ी बताई जा रही है। हालांकि, इन आरोपों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से यह मामला चर्चा में है, उसने सिस्टम पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
कुंभ जैसे आयोजन में हजारों करोड़ रुपये के काम होते हैं, जिनमें इंफ्रास्ट्रक्चर, सफाई, सुरक्षा, टेंट और अन्य व्यवस्थाएं शामिल होती हैं। ऐसे में टेंडर प्रक्रिया की निष्पक्षता बेहद अहम हो जाती है। यदि इसमें किसी प्रकार का बाहरी दबाव या प्रभाव सामने आता है, तो यह न केवल सरकारी दावों पर सवाल उठाता है, बल्कि आयोजन की साख को भी प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन यदि चर्चाएं हकीकत में बदलती हैं, तो सरकार के लिए अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को जमीन पर साबित करना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

