देहरादून,उधमसिंह नगर, हरिद्वार के अलावा भी हैं अस्पताल… वहां कब होगी फायर सेफ्टी की जांच… ? या हो रहा बड़ी दुर्घटना का इंतजार….?

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देहरादून। उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा लगातार सवालों के घेरे में आता जा रहा है। राज्य में भले ही निजी अस्पतालों और क्लीनिकों की संख्या तेजी से बढ़ी हो, लेकिन सरकारी निगरानी का दायरा आज भी कुछ चुनिंदा जनपदों तक सीमित दिखाई देता है। देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर में किसी भी घटना के बाद प्रशासन तुरंत सक्रिय हो जाता है, निरीक्षण शुरू हो जाते हैं और अधिकारियों की बैठकों का दौर चल पड़ता है, लेकिन पहाड़ी और अन्य जिलों में चल रहे अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लीनिकों की स्थिति पर शायद ही कभी गंभीरता दिखाई देती हो।

हाल ही में देहरादून स्थित पेनएशिया अस्पताल में लगी आग की घटना ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा तो सरकारी तंत्र हरकत में आ गया। अस्पतालों के फायर सेफ्टी सिस्टम, इमरजेंसी इंतजाम और लाइसेंसिंग प्रक्रिया को लेकर अचानक निरीक्षण अभियान शुरू हो गया। अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए और स्वास्थ्य विभाग लगातार बैठकें करने में जुट गया।

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लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या सिस्टम केवल हादसों के बाद ही जागेगा? राजधानी देहरादून की तंग गलियों और रिहायशी इलाकों में बड़ी संख्या में छोटे अस्पताल, क्लीनिक और डायग्नोस्टिक सेंटर संचालित हो रहे हैं। इनमें से कई जगहों पर न तो पार्किंग की व्यवस्था है, न फायर सेफ्टी के पर्याप्त इंतजाम और न ही आपातकालीन निकासी के सुरक्षित रास्ते। बावजूद इसके ये संस्थान वर्षों से संचालित हो रहे हैं। आखिर इन पर निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है, यह सवाल अब आम लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बन चुका है।

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स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। विभागीय स्तर पर समय-समय पर बैठकों, निरीक्षणों और दिशा-निर्देशों की लंबी सूची जरूर तैयार होती है, लेकिन धरातल पर उसका असर बेहद सीमित दिखाई देता है। कई बार निरीक्षण केवल कागजों तक सिमट जाते हैं और कार्रवाई भी खानापूर्ति बनकर रह जाती है। यही वजह है कि नियमों की अनदेखी करने वाले संस्थानों के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं।

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स्थिति यह है कि जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए, तब तक सिस्टम को सुरक्षा मानकों की याद तक नहीं आती। आग लगने, मरीजों की मौत या किसी अन्य गंभीर घटना के बाद ही अचानक सक्रियता दिखाई जाती है। इसके बाद कुछ दिन अभियान चलता है और फिर पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य संस्थानों की निगरानी केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। राज्य के सभी जनपदों में समान रूप से फायर सेफ्टी, और चिकित्सा व्यवस्थाओं की नियमित जांच होनी चाहिए। वरना एक और बड़ा हादसा होने का इंतजार करना सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता माना जाएगा।

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