उत्तराखंड में गर्मी बढ़ने के साथ ही बिजली की किल्लत गंभीर हो गई है, जिससे ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों में बिजली कटौती का सिलसिला शुरू हो चुका है। वर्तमान में राज्य में बिजली की मांग 4.4 करोड़ यूनिट तक पहुंच गई है, जबकि उपलब्धता केवल 4.3 करोड़ यूनिट ही है। इस 10 लाख यूनिट के अंतर को पाटने के लिए यूपीसीएल को मजबूरन ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कस्बों और स्टील फर्नेस उद्योगों में बिजली कटौती करनी पड़ रही है। हालांकि, विभाग को उम्मीद है कि पहाड़ों पर बर्फ पिघलने से नदियों का जलस्तर बढ़ेगा, जिससे जलविद्युत उत्पादन में सुधार हो सकता है।
बिजली की बढ़ती मांग और उत्पादन का गणित
इस महीने बिजली की खपत में भारी उछाल देखा गया है। 1 अप्रैल को मांग जहाँ 4.1 करोड़ यूनिट थी, वह 15 अप्रैल तक बढ़कर 4.3 करोड़ और अब 4.4 करोड़ यूनिट के पार जा चुकी है। इसके विपरीत, स्थानीय स्तर पर बिजली का उत्पादन काफी कम है। 10 अप्रैल को उत्पादन मात्र 80 लाख यूनिट दर्ज किया गया, जबकि सामान्य दिनों में यह 2.4 करोड़ यूनिट तक रहता है। केंद्रीय पूल से भी राज्य को रोजाना केवल 1.4 करोड़ यूनिट बिजली ही मिल पा रही है, जिससे मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा गैप पैदा हो गया है।
कहाँ और कितनी हो रही है कटौती?
फिलहाल यूपीसीएल ने अघोषित कटौती का सहारा लिया है। हरिद्वार और उधमसिंह नगर के ग्रामीण इलाकों में 25 मिनट से लेकर 1 घंटे तक की कटौती की जा रही है। छोटे कस्बों में यह समय 10 से 20 मिनट है, जबकि अन्य कस्बों में 1 घंटे तक बिजली काटी जा रही है। सबसे ज्यादा प्रभाव स्टील फर्नेस इंडस्ट्री पर पड़ा है, जहाँ रोजाना 3 घंटे की कटौती की जा रही है। प्रशासन का कहना है कि यह कटौती अचानक पैदा हुई आपूर्ति की कमी के कारण है।
ग्लेशियर पिघलने से है राहत की उम्मीद
बिजली संकट का मुख्य कारण नदियों में जलस्तर का कम होना है, जिससे यूजेवीएनएल के पावर हाउस अपनी पूरी क्षमता से बिजली पैदा नहीं कर पा रहे हैं। अधिकारियों का मानना है कि जैसे-जैसे पहाड़ों पर गर्मी बढ़ेगी और ग्लेशियर पिघलेंगे, नदियों में पानी बढ़ेगा। इससे जलविद्युत उत्पादन में तेजी आएगी और आने वाले दिनों में जनता को बिजली कटौती से राहत मिल सकेगी।

