महिलाओं की आड़,नेताओं का वार, ठेकों पर सियासी करोबार

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उत्तराखंड में शराब का करोबार गजब का धंधा है..विपक्ष शराब के कारोबार को आगे कर सत्ता पर आरोपों के बाण चलाना शुरू कर देता है। ठीक उसी अंदाज में जैसे महाभारत के युद्ध मे भीष्म पितामाह को धराशाई करने के लिए माधव ने शिखंडी को आगे किया था। बहरहाल देखा जा रहा है कि उत्तराखंड में शराब एक हॉट टॉपिक है..स्थानीय स्तर पर शराब की दुकान का विरोध अपनी नेतागिरी चमकाने की गारंटी बन गया है।

देखा गया है कि नेतागिरी चमकाने के चक्कर में लोकल नेता मुंगेरीलाल की तरह ख्वाब देखना शुरू कर देता है कि शराब की दुकान का शटर डाउन होगा और मेरी नेता गिरी के शोरूम का शटर ओपन हो जाएगा। लिहाजा विरोध करने वाले महिलाओं को आगे कर के अपना उल्लू सीधा करना शुरू कर देते हैं। सुना तो ये भी गया है विरोध दबाने की एवज में दुकान मालिक को सौदेबाजी की टेबल पर बिठाया जाता है। कई कानो सुने आंखों देखे किस्से विरोध की परिधि के बाहर सुने जाते रहे हैं।

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बहरहाल असल सवाल ये है कि उत्तराखंड़ में शराब की दुकान के विरोध का ग्राफ इतनी तेजी से उठता और गिरता क्यों है। खासकर मौजूदा सरकार के दौर में, अपना उल्लू सीधा करने की हसरत पाली जमात शराब की दुकान को इस अंदाज में पेश करती है मानो भीषण आपदा आ गई हो। ऐसी आपदा जो लाईलाज हो। लेकिन सवाल ये है कि जब से राज्य बना है तब से लेकर अब तक ऐसी कौन सी सरकार रही जिसने शराब के धंधे से तौबा की हो। जिसने राजस्व के लिए शराब की बोतल का मुंह न ताका हो। सन्2000 जब से राज्य बना है तब से लेकर अबतक हर सरकार ने शराब के धंधे पर अपना प्यार लुटाया है। उसे सहेजा है उसे पुचकारा है उसे दुलारा है ताकि राज्य के खर्चे पानी का इंतजाम हो सके।

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ऐसा नहीं कि विपक्ष दूध का धुला हुआ हो,जब राज्य में कांग्रेस की सरकार रही है तब भी राज्य में शराब बिकी है। जब भाजपा की सरकार में यूकेडी शामिल थी तब भी उत्तराखंड में शराब का धंधा हुआ है। सीधी सी बात है जब हर सरकार के दौर में शराब का कारोबार राजस्व का जरिया रहा है तो इस सरकार पर शराब के धंधे की तोहमत क्यों। पहले तो राज्य में धुआंधार अवैध शराब का धंधा भी होता रहा है देखा जाए तो उस अवैध कारोबार पर अब रोक लगी है।पर्याप्त दुकाने हैं तो शराब तस्कर खामोश हैं और तस्करी बंद। लिहाजा मदिरा के शौकीनों को अब जरूरत से ज्यादा पैसे देकर जहर खरीदने की जरूरत नहीं है। विरोध से सिर्फ कुछ वक्त के लिए अराजकता पैदा होती है फिर वहीं ढाक के तीन पात।

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बहरहाल राज्य में शराब की दुकानो के विरोध के पीछे कहीं तस्करों का हाथ तो नहीं जिनका अवैध शराब का धंधा घुटनो के बल बैठ गया है। या इस विरोध के पीछे का सच कहीं ये तो नहीं कि लोकल नेता अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए मातृशक्ति को बहकाते हों और कुछ दिन नारे बाजी कर दुकान मालिक को समझौते की टेबिल पर लाकर बिठा देते हों और पर्दे के पीछे संरक्षण देने की बात कर अपना हिस्सा फिक्स कर देते हों। अगर ऐसा नहीं है तो फिर ये क्या चक्कर है कि ‘उनको’ सिर्फ खुलती हुई शराब की दुकान ही अखरती है

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