देहरादून। उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड की याचिका पर बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य में खुले बाजार से बिजली खरीदने वाले उपभोक्ताओं पर 67 पैसे प्रति यूनिट का अतिरिक्त अधिभार लागू कर दिया है।
इस फैसले से प्रदेश के उन तमाम बड़े और औद्योगिक उपभोक्ताओं को झटका लगा है जो सीधे खुले बाजार से सस्ती बिजली की खरीद करते हैं। हालांकि यूपीसीएल ने अपनी याचिका में 88 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्त अधिभार की मांग की थी, लेकिन आयोग ने आंकड़ों के आकलन के बाद इसे घटाकर 67 पैसे तय किया है।
उत्तराखंड में कई बड़े औद्योगिक उपभोक्ता अपनी सुविधा और आर्थिक लाभ के लिए खुले बाजार से बिजली की खरीद करते हैं। दूसरी ओर, यूपीसीएल को राज्य के सभी उपभोक्ताओं को निर्बाध आपूर्ति देने के लिए पावर प्लांटों से बिजली अनुबंधित रखनी पड़ती है।
यूपीसीएल को इस अनुबंधित बिजली का एक निश्चित शुल्क हर हाल में चुकाना ही पड़ता है। जब बड़े उद्योग खुले बाजार से बिजली ले लेते हैं, तो यूपीसीएल की अनुबंधित बिजली बिना इस्तेमाल के सरेंडर हो जाती है। इसी अप्रयुक्त बिजली के फिक्स्ड चार्ज की भरपाई के लिए विद्युत अधिनियम 2003 के तहत ओपन एक्सेस उपभोक्ताओं पर यह अधिभार लगाया जाता है।
यूपीसीएल ने नियामक आयोग में याचिका दाखिल कर बताया था कि अक्टूबर 2025 से मार्च 2026 की अवधि के दौरान ओपन एक्सेस के कारण कुल 32.49 करोड़ यूनिट बिजली अप्रयुक्त रह गई थी। निगम के मुताबिक इस अवधि में छह पावर प्लांटों का फिक्स्ड खर्च कुल 37.91 करोड़ रुपये आया था। इसी वित्तीय नुकसान का हवाला देते हुए यूपीसीएल ने 88 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्त अधिभार वसूलने का प्रस्ताव आयोग को सौंपा था।
याचिका पर सुनवाई के दौरान कुमाऊं-गढ़वाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री समेत कई प्रमुख औद्योगिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। उद्योगों का तर्क था कि 132 केवी और उससे अधिक वोल्टेज पर जुड़े उपभोक्ताओं पर यह अधिभार नहीं लगना चाहिए और इसे अतिरिक्त वसूली का जरिया बनाया जा रहा है।
हालांकि, नियामक आयोग ने नियमों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि ओपन एक्सेस सुविधा लेने वाले सभी उपभोक्ता इस अधिभार के दायरे में आते हैं और उद्योगों की सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया। मामले की सुनवाई कर रही आयोग के अध्यक्ष एमएल प्रसाद, सदस्य अनुराग शर्मा और सदस्य प्रभात किशोर डिमरी की पीठ ने यूपीसीएल के आंकड़ों की गहन जांच की।
स्लॉट-वार समीक्षा में आयोग ने पाया कि वास्तव में अप्रयुक्त बिजली 27.97 करोड़ यूनिट और फिक्स्ड लागत 34.26 करोड़ रुपये थी। ट्रांसमिशन व डिस्ट्रीब्यूशन लॉस जैसे तकनीकी नुकसानों को समायोजित करने के बाद आयोग ने पाया कि वास्तविक अधिभार 67 पैसे प्रति यूनिट ही बनता है और इसी दर को लागू करने की अंतिम स्वीकृति दी।

