देहरादून। उत्तराखंड के मानसूनी पैटर्न में बड़ा और चिंताजनक बदलाव देखने को मिल रहा है। मौसम विज्ञान केंद्र के 41 वर्षों के आंकड़ों पर आधारित शोध में खुलासा हुआ है कि अब राज्य में पहाड़ों की तुलना में मैदानी इलाकों में अधिक मूसलाधार बारिश हो रही है। मौसम विभाग के निदेशक बिक्रम सिंह और वैज्ञानिक रोहित थपलियाल का यह महत्वपूर्ण शोध पत्र एक प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
अनुसंधान के लिए देहरादून और पंतनगर को मैदानी क्षेत्रों तथा मुक्तेश्वर और टिहरी को पहाड़ी क्षेत्रों के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। आंकड़ों के मुताबिक, मानसून के दौरान भारी से अत्यधिक भारी बारिश वाले दिनों की औसत संख्या देहरादून में सबसे ज्यादा 7.1 दिन और पंतनगर में 4.2 दिन दर्ज की गई। इसके विपरीत पहाड़ी क्षेत्र मुक्तेश्वर में यह मात्र 2.3 दिन और टिहरी में केवल 1.7 दिन रही।
अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि कुल मानसूनी वर्षा में ‘चरम बारिश’ का बड़ा हिस्सा अब मैदानी इलाकों में दर्ज हो रहा है। देहरादून में कुल मानसूनी बारिश का 37 प्रतिशत हिस्सा भारी या अत्यधिक भारी बारिश के रूप में गिरता है। वहीं पंतनगर में यह योगदान 33 प्रतिशत, मुक्तेश्वर में 24 प्रतिशत और टिहरी में महज 19 प्रतिशत रिकॉर्ड किया गया है।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, पूरे साल में उत्तराखंड के भीतर होने वाली कुल 1477.6 मिमी बारिश का करीब 79 फीसदी (1162.7 मिमी) हिस्सा अकेले जून से सितंबर के मानसूनी सीजन में ही बरस जाता है। जुलाई में औसतन 417.8 मिमी और अगस्त में 385.7 मिमी बारिश होती है। इन दोनों महीनों में भारी बारिश वाले दिनों की संख्या सबसे ज्यादा रहती है और इसमें साल-दर-साल कम बदलाव देखने को मिलता है।
शोध में यह भी पाया गया कि देहरादून, मुक्तेश्वर और पंतनगर में बहुत हल्की बारिश वाले दिनों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। वहीं दूसरी ओर, पूरी तरह सूखे रहने वाले दिनों की संख्या में कमी आई है। भारी बारिश ही राज्य में बाढ़ और भूस्खलन जैसी जल-वैज्ञानिक आपदाओं का मुख्य कारण बनती है।
आफताब अजमत की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, मौसम वैज्ञानिकों का यह शोध पत्र राज्य सरकार, आपदा प्रबंधन विभाग और कृषि विशेषज्ञों के लिए भावी नीतियां तैयार करने में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा।

