देहरादून। उत्तराखंड में नीट काउंसलिंग के दौरान फर्जी प्रमाण पत्रों के जरिए MBBS में दाखिला लेने के मामले में हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने राज्य के राजस्व सचिव को निर्देश दिए हैं कि सभी संदिग्ध आरक्षण सर्टिफिकेट्स की दो साल के भीतर गहराई से जांच और सत्यापन पूरा किया जाए।
नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यह आदेश जारी किया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि इस बड़े फर्जीवाड़े की जांच के लिए पहले ही एक विशेष जांच टीम का गठन किया जा चुका है। सरकार का पक्ष सुनने और मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने इस याचिका को निस्तारित कर दिया।
एसआईटी की प्राथमिक जांच में खुलासा हुआ है कि फर्जी आरक्षण प्रमाण पत्र जारी कराने का यह काला कारोबार 45 लाख रुपये तक में होता था। यह पूरा नेटवर्क देहरादून से लेकर उधमसिंह नगर तक फैला हुआ है। इस खेल में राजस्व विभाग के कर्मचारियों और पटवारियों की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है, जिन्होंने बिना धरातलीय सत्यापन के ही रिपोर्ट लगा दी थी।
जांच के दौरान पता चला है कि जाली दस्तावेजों के सहारे करीब 770 ऐसे अभ्यर्थियों ने आरक्षण का लाभ उठाया, जो उत्तराखंड के मूल निवासी हैं ही नहीं। इन फर्जी अभ्यर्थियों के शैक्षणिक दस्तावेज तमिलनाडु, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से जुड़े पाए गए हैं। फर्जीवाड़ा सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कोटे तक सीमित नहीं था, बल्कि ईडब्ल्यूएस, निवास प्रमाण पत्र और आधार कार्ड तक फर्जी बनाए गए थे।
कार्रवाई के तहत एचएनबी मेडिकल यूनिवर्सिटी अब तक 20 फर्जी दाखिलों को निरस्त कर चुकी है। यूनिवर्सिटी द्वारा पहली और दूसरी काउंसलिंग में आरक्षण का लाभ लेने वाले 754 छात्र-छात्राओं के प्रमाण पत्रों की जांच की जा रही है। देहरादून और उधमसिंह नगर में फर्जी पाए गए दाखिलों को रद्द करने के साथ ही संबंधित आरोपियों के खिलाफ पुलिस मुकदमे भी दर्ज कराए गए हैं।

