देहरादून। जलवायु परिवर्तन की बढ़ती मार के कारण अब हिमालयी क्षेत्रों में स्थित विशाल ग्लेशियरों के अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडराने लगा है। गंगोत्री समेत ‘हाई माउंटेन एशिया’ के चार बड़े ग्लेशियरों की ऊपरी परत पर बर्फ घटने की रफ्तार अचानक तेज हो गई है।
अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका रीजनल एनवायरनमेंटल चेंज में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2015 के बाद से ऊंचे पर्वतीय ग्लेशियरों में यह खिसकाव और बर्फ का नुकसान बेहद स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पहले आमतौर पर ग्लेशियरों के निचले हिस्सों में ही बर्फ का पिघलना देखा जाता था, लेकिन अब अत्यधिक ऊंचाई वाले हिस्से भी इसकी चपेट में हैं। उपग्रह तस्वीरों के अध्ययन से गंगोत्री, बाल्टोरो, बड़ा शिगरी और फेडचेंको ग्लेशियर में वर्ष 2009 से 2022 के बीच हुए इस चिंताजनक बदलाव की पुष्टि हुई है।
यह महत्वपूर्ण अध्ययन भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु के वैज्ञानिक अरिंदन मंडल के नेतृत्व में किया गया है। इस संयुक्त शोध दल में IISc बेंगलुरु के अलावा IIT कानपुर, IIT इंदौर और ICIMOD काठमांडू के विशेषज्ञ वैज्ञानिक शामिल रहे। अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि गंगोत्री ग्लेशियर में वर्ष 2009 से 2015 तक बर्फ की मोटाई 0.53 मीटर प्रति वर्ष घट रही थी, जो 2015 से 2022 के दौरान बढ़कर 0.71 मीटर प्रति वर्ष हो गई है।
इसी तरह बाल्टोरो ग्लेशियर में बर्फ घटने की दर 0.22 मीटर से बढ़कर 0.48 मीटर प्रति वर्ष तथा फेडचेंको ग्लेशियर में 0.08 मीटर से बढ़कर 0.37 मीटर प्रति वर्ष हो चुकी है। बड़ा शिगरी ग्लेशियर में यद्यपि हाल के वर्षों में दर 1.43 मीटर से घटकर 0.83 मीटर हुई है, फिर भी कुल बर्फ का नुकसान काफी अधिक बना हुआ है। IISc के वैज्ञानिक अरिंदन मंडल ने चेतावनी दी है कि यदि सर्दियों में कम बर्फबारी का दौर यूं ही जारी रहा, तो ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का सीधा असर भविष्य में नदियों के जल प्रवाह और देश की जल सुरक्षा पर पड़ सकता है।

