देहरादून। उत्तराखंड में अवैध और बिना मानकों के चल रहे मदरसों के खिलाफ जारी प्रशासनिक कार्रवाई के बाद राज्य का सियासी पारा चढ़ गया है। देहरादून से सामने आए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के कुल 452 मदरसों में से 179 मदरसों को मानक पूरे न करने पर बंद करा दिया गया है, जबकि 19 मदरसों को पूरी तरह सील कर दिया गया है। इस कार्रवाई से राज्य के लगभग 40 फीसदी मदरसों का संचालन ठप हो गया है।
फरवरी 2026 में राज्य सरकार द्वारा गठित ‘राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ के तहत प्रदेश में मदरसों और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को नए सिरे से मान्यता दी जा रही है। वर्तमान में राज्य में केवल 30 मदरसों के पास ही वैध मान्यता है, जबकि 134 संस्थानों ने शिक्षा विभाग में मान्यता के लिए नया आवेदन किया है।
बड़े पैमाने पर हुई इस कार्रवाई को लेकर विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री नवीन जोशी ने इसे चुनाव से प्रेरित बताते हुए कहा कि चुनाव नजदीक आते ही भाजपा को मदरसे याद आने लगते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बिना वैध मदरसों का सही आंकड़ा सार्वजनिक किए एकतरफा कार्रवाई कर ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है।
वहीं, कांग्रेस के आरोपों का पलटवार करते हुए उत्तराखंड मदरसा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष मुफ्ती समून काजमी ने इन दावों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने कभी भी मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक नहीं माना। कार्रवाई केवल उन्हीं संस्थानों या मजारों पर हो रही है जो पूरी तरह अवैध और बिना मानकों के संचालित हैं।
मुफ्ती काजमी ने स्पष्ट किया कि जो मदरसे नियमों के तहत संचालित होना चाहते हैं, उनके लिए मान्यता का विकल्प पूरी तरह खुला हुआ है। हालांकि, गैर-कानूनी तरीके से चल रहे संस्थानों को छूट नहीं दी जा सकती। उन्होंने साफ किया कि राज्य में अवैध संरचनाओं और बिना मान्यता वाले मदरसों के खिलाफ जांच एवं सीलिंग की यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।
राज्य में मदरसों के मानकीकरण और सीलिंग को लेकर शुरू हुई यह बहस अब सीधे तौर पर प्रशासनिक सुधार बनाम राजनीतिक बयानबाजी का रूप ले चुकी है। जहां सरकार इसे शिक्षा में पारदर्शिता लाने का कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे आगामी चुनावों से जोड़कर देख रहा है।

