देहरादून। कौंसिल ऑन एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वॉटर और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की एक संयुक्त अध्ययन रिपोर्ट में उत्तराखंड के पर्यावरण को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2050 तक प्रदेश के 9 पहाड़ी जिलों में अत्यधिक गर्म रातों की संख्या में औसतन ढाई गुना से अधिक की बढ़ोतरी हो सकती है। इस खतरे को देखते हुए आपदा प्रबंधन विभाग ने सभी जिलों को तत्काल ‘हीट वेव एक्शन प्लान’ तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
अध्ययन में वर्ष 1982 से 2024 तक के मौसमी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि राज्य में अत्यधिक गर्म रातों की संख्या धीरे-धीरे बढ़कर औसतन 18 से 19 रात प्रति वर्ष हो चुकी है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि मध्य सदी यानी 2050 तक यह रुझान और खतरनाक रूप ले लेगा, जिससे पहाड़ों में दिन ढलने के बाद मिलने वाली पारंपरिक ठंडक गायब हो जाएगी।
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि मैदानी इलाकों से ज्यादा पहाड़ी जिले इसकी चपेट में आएंगे। चमोली में सालाना अत्यधिक गर्म रातों की संख्या बढ़कर 52, टिहरी में 51 और चंपावत में 50 तक पहुंचने का अनुमान है। इसके अलावा देहरादून और अल्मोड़ा में 49-49 रातें, पौड़ी में 47, नैनीताल व उधम सिंह नगर में 46-46 और हरिद्वार में 40 अत्यधिक गर्म रातें हो सकती हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, गर्म रातों की संख्या बढ़ने के पीछे मुख्य रूप से घाटी वाले क्षेत्रों की उपस्थिति, ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता और लगातार हो रहा कंक्रीटीकरण है। इसके अलावा बादलों व नमी के बदलते स्वरूप और विकिरणीय शीतलन में हो रहे बदलाव भी पहाड़ों के तापमान को बढ़ा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या में बहुत बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिलेगा। उदाहरण के तौर पर, देहरादून में अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या लगभग 19 के आसपास ही स्थिर रहेगी, जबकि चमोली में यह संख्या 19 से मामूली बढ़कर 26 तक जा सकती है।
रिपोर्ट में देश के अन्य हिस्सों का भी उल्लेख किया गया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, एट्रिया विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र के अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1971 से 2022 के बीच दक्षिण भारत सबसे तेजी से सूखने वाला क्षेत्र बनकर उभरा है।

