नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने प्रदेशभर के सरकारी अस्पतालों में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सख्त रुख अपनाया है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की रिपोर्ट पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने स्वास्थ्य सचिव को स्वास्थ्य सुविधाओं को दुरुस्त करने के लिए विस्तृत कार्ययोजना (Plan) पेश करने के कड़े निर्देश दिए हैं।
सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य सचिव समेत अन्य वरिष्ठ अधिकारी कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। अधिकारियों ने दावा किया कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं सुचारू रूप से चल रही हैं और खाली पदों पर जल्द नियुक्तियां की जाएंगी। हालांकि, हाईकोर्ट ने अधिकारियों के दावों से असहमति जताते हुए तीखे सवाल पूछे।
अदालत ने स्वास्थ्य सचिव से पूछा कि कई अस्पतालों से विशेषज्ञ डॉक्टरों का स्थानांतरण कर दिया गया, लेकिन उनकी जगह दूसरे डॉक्टरों की तैनाती क्यों नहीं की गई? कोर्ट ने राज्य के किस अस्पताल में क्या-क्या कमियां हैं, इसका पूरा ब्योरा पेश करने का आदेश दिया।
सुनवाई के दौरान जब विभाग ने नैनीताल अस्पताल के आईसीयू को चालू बताया, तो खंडपीठ ने स्वास्थ्य सचिव को खुद जाकर मौका मुआयना करने को कहा। कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि नैनीताल में एक छोटे से ईसीजी के लिए भी मरीज को हल्द्वानी रेफर कर दिया जाता है। कागजों में सब कुछ ठीक दिखाया जा रहा है, जबकि धरातल पर हकीकत अलग है।
मामले में न्यायमित्र ने अदालत को बताया कि हाल ही में राजकीय मेडिकल कॉलेज सुशीला तिवारी के 16 वरिष्ठ डॉक्टरों और नैनीताल के बीडी पांडे अस्पताल के डॉक्टरों का स्थानांतरण कर दिया गया। उनकी जगह नए डॉक्टरों की नियुक्ति न होने से दोनों प्रमुख अस्पतालों में आने वाले मरीजों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
न्यायमित्र ने सवाल उठाया कि डॉक्टरों का तबादला ऐसे अस्पतालों में किया जा रहा है जो अभी पूरी तरह शुरू ही नहीं हुए हैं। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए नैनीताल सेनेटोरियम अस्पताल को सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बनाने संबंधी अप्रूवल रिपोर्ट मांगी है और मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की है।

