देहरादून। मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना के तहत सोलर प्लांट लगाकर बिजली पैदा करने वाले उद्यमी खुद गंभीर बिजली संकट और भारी आर्थिक नुकसान से जूझ रहे हैं। उत्तरकाशी जिले में उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के बेहद कमजोर सप्लाई नेटवर्क के कारण सोलर प्लांट संचालकों को दैनिक स्तर पर घाटा उठाना पड़ रहा है। इस समस्या से परेशान होकर योजना के लाभार्थियों ने अब उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग में शिकायत दर्ज कराई है और ‘डीम्ड जनरेशन’ के मानकों के तहत मुआवजे की मांग की है।
उत्तरकाशी और आसपास के इलाकों में राज्य सरकार के प्रोत्साहन पर बड़ी संख्या में युवाओं ने सोलर पावर प्लांट स्थापित किए हैं। हालांकि, यूपीसीएल ने बिना इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षमता जांचे ऐसे क्षेत्रों में भी सोलर प्लांट लगाने की एनओसी दे दी, जहां की बिजली लाइनें सोलर से पैदा होने वाली बिजली का भार उठाने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
सोलर प्लांट संचालकों का कहना है कि जब दोपहर में तेज धूप के दौरान बिजली का उत्पादन अपने उच्चतम स्तर पर होता है, ठीक उसी समय यूपीसीएल द्वारा क्षेत्र की पावर सप्लाई बंद कर दी जाती है। मुख्य ग्रिड बंद रहने के कारण सोलर पैनलों द्वारा बनाई जा रही बिजली ग्रिड में नहीं जा पाती और पूरी ऊर्जा बेकार हो जाती है।
कल्याणी सब-स्टेशन से जुड़े बड़ेथ गांव के निवासी और सोलर उत्पादक संजय सिंह ने बताया कि दोपहर के समय रोजाना चार से पांच घंटे तक बिजली की सप्लाई पूरी तरह ठप रखी जा रही है। जिस समय सबसे ज्यादा कमाई और उत्पादन होना चाहिए, उसी समय पावर कट होने से उनका दैनिक सोलर उत्पादन शून्य हो जाता है।
बिजली आपूर्ति में इस लगातार गड़बड़ी और रोजाना हो रहे वित्तीय नुकसान को देखते हुए सोलर पावर संगठनों ने नियामक आयोग का रुख किया है। संचालकों ने मांग की है कि जब तक यूपीसीएल अपना सप्लाई नेटवर्क दुरुस्त नहीं करता, तब तक नियमानुसार उन्हें हुए वित्तीय नुकसान की भरपाई डीम्ड जनरेशन मानकों के तहत की जाए।
यूपीसीएल के इस ढुलमुल रवैये से न केवल सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने की मुख्यमंत्री की ड्रीम योजना पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि स्वरोजगार का सपना देखकर लाखों का कर्ज लेने वाले स्थानीय युवाओं का आर्थिक भविष्य भी संकट में पड़ गया है।

