देहरादून। पेरिस और नई दिल्ली में शुक्रवार को शिक्षा में लैंगिक समानता को लेकर यूनेस्को की ओर से जारी रिपोर्ट में भारत को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के शहरी क्षेत्रों ने स्कूली पढ़ाई पूरी करने के मामले में लड़के और लड़कियों के बीच लगभग पूर्ण समानता हासिल कर ली है, लेकिन ग्रामीण भारत में पहुंच और समानता की स्थिति अब भी चिंताजनक है। इस विषमता का सीधा असर ग्रामीण क्षेत्र की बालिकाओं के उच्च शैक्षणिक भविष्य पर पड़ रहा है।
यूनेस्को की “जेंडर इक्वैलिटी इन एक्सेस टू एजुकेशन” रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारत में उच्च माध्यमिक स्तर पर 100 लड़कों के मुकाबले केवल 59 लड़कियां ही अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर पाती हैं। ग्रामीण इलाकों में इस लैंगिक असमानता की मुख्य वजह गरीबी और सामाजिक सुरक्षा की कमी को माना गया है। देश के कुल औसत की बात करें तो उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का एडजस्टेड जेंडर पैरिटी इंडेक्स 0.89 दर्ज किया गया है, यानी राष्ट्रीय स्तर पर 100 लड़कों के मुकाबले 89 लड़कियां 12वीं पास कर पा रही हैं।
हालांकि, रिपोर्ट में पिछले ढाई दशकों की प्रगति को भी रेखांकित किया गया है। बीते 25 वर्षों में भारत ने अपनी शुरुआती कमियों को 65 प्रतिशत यानी दो-तिहाई से अधिक तक कम कर लिया है। इसी आधार पर यूनेस्को ने भारत को स्कूली शिक्षा के अंतर को पाटने के मामले में “फास्ट प्रोग्रेस” श्रेणी में रखा है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2000 में भारत दुनिया के उन 47 देशों में शामिल था जहां लड़कियां सबसे ज्यादा पढ़ाई छोड़ती थीं, लेकिन अब इसमें उल्लेखनीय सुधार आया है।
इसके अलावा, यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट में शुरुआती बचपन की शिक्षा को लेकर भी चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। भारत में 5 साल के आधे से अधिक यानी 51 प्रतिशत बच्चे आंगनवाड़ी या नर्सरी-केजी जाने के बजाय सीधे प्राइमरी स्कूल में दाखिला ले रहे हैं। रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लैंगिक खाई को पाटने और शुरुआती शिक्षा को मजबूत करने के लिए भारत को अपने शिक्षा बजट में वंचित तबकों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

