दवा से पहले दस्तावेज, क्या यही है इलाज का नया मॉडल..!

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उत्तराखंड में सेहत का सवाल यक्ष प्रश्न है जिसका किसी के पास कोई जवाब ही नहीं। इसे किसी के दर्द का अहसास नहीं होता न पीड़ा से छटपटाते इंसान की आह सुनाई देती है। लीक पर चलने का आदी स्वास्थ्य विभाग किसी के जख्मों पर मरहम लगाने उसे दर्द से राहत देने से पहले कागजी खानापूर्ति में दिलचस्पी दिखाता है।

ये हम इसलिए कह रहे हैं कि यहां अस्पतालों में ऐसा हो रहा है। सेहत के यक्ष प्रश्न का उत्तर केंद्र सरकार ने एम्स के तोहफे से दिया था लेकिन उसकी चार दीवारी के भीतर भी राहत और सुकून नहीं दिखता। खबर है कि एम्स में पीड़ा से राहत पाने के लिए पहुंचे मरीजो को पहले इलाज नहीं आयुष्मान कार्ड की औपचारिकताएं पूरी करवानी होती हैं।

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चाहे वो दर्द से बिलबिलाता ही क्यों न हो उसकी आह से एम्स में तैनात धरती के भगवान नहीं पसीजते। ये तस्वीरें बता रही हैं कि ऋषिकेश का एम्स मरीजों के साथ कैसा बर्ताव कर रहा है। पहले दर्द पर दवा नहीं, आयुष्मान कार्ड की औपचारिकताओं का नश्तर चलाया जाता है।

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ऐसे में सवाल उठता है कि जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे किसी मरीज के परिजनो को आयुष्मान कार्ड की औपचारिकताओं ने मर्सिया पढ़ने को मजबूर कर दिया तो क्या होगा। क्योंकि बीमारी और दुर्घटना उस बला का नाम है जिसे कोई नहीं चाहता लेकिन वो बिना बुलाए ही दस्तक दे देती है। लिहाजा जरूरत है सरकार को निगरानी रखने की और अस्पतालों को रहमदिल बनने की ताकि दर्द से छटपटाते लोगों को मुलाजिमों में मसीहा नजर आए।