क्या चार धाम यात्रा में चल रहा अर्बन नक्सलवाद….? तो फिर ‘अतिथि देवो भवः’ की धरती पर नकारात्मकता का जहर कौन घोल रहा?

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उत्तराखंड की चारधाम यात्रा पीक पर है। शीतकाल के बाद ग्रीष्मकाल के लिए धामों के कपाट खुले हैं। चारो धामों में देवी-देवताओं के जयकारे गूंज रहे हैं। दूर-दराज से आस्थावान श्रद्धालु धामो का रुख कर रहे हैं। 19 अप्रैल से शुरू हुई यात्रा को अभी एक हफ्ता भी पूरा नहीं हुआ है। चार धाम यात्रा बेहतरीन तरीके से संपन्न हो सके। हर श्रद्धालु की यात्रा मंगलमय हो वो सुगमता से देवदर्शन कर सके उत्तराखंड सरकार इसकी भरसक कोशिश कर रही है।

अतिथि देवो भवः के दर्शन को अपना कर चारधाम यात्रा अपने ग्रीष्मकालीन पड़ाव को पूरा कर संपन्न हो इसके लिए उत्तराखंड सरकार का पूरा सिस्टम जुटा हुआ है। लेकिन देखा जा रहा है कि मामूली सी भूल-चूक पर कैकयी विलाप करने वाला तबका हायतौबा मचा रहा है। सोशल मीडिया पर ऐसी-ऐसी पोस्ट और वीडियो अपलोड किए जा रहे हैं जिनसे सरकार की नहीं बल्कि देवभूमि उत्तराखंड की इमेज पर फर्क पड़ रहा है।

उत्तराखंडी समाज जो दोनो हाथ बढ़ा कर खुले दिल से अतिथियों का स्वागत करता है उसकी बदनामी हो रही है। लेकिन उन्हें अपनी पोस्ट पर लाईक्स, कंमेट चाहिए फिर चाहे देवभूमि के दामन पर ही दाग क्यों न लग जाए। इस स्वार्थी तबके को समाज के दानिशमंद लोग अरबन नक्सल तक का नाम दे रहे हैं बावजूद इसके, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा। दरअसल देखा जाए तो उत्तराखंड की चार धाम यात्रा ऊंचे पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरती है।

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जहां मंदिर हों या उसका आंगन या फिर रास्ता तकरीबन छह माह तक बर्फ में ही समाधिस्थ रहते हैं। ऐसे में चाक-चौबंद इंतजामो के साथ चारधाम यात्रा का आगाज करना सिर पर कंघी फेरने जैसा नहीं होता बल्कि लोहे के चने चबाना जैसी चुनौती होता है। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में मजदूरों से काम करवाना हो या मशीनो को काम के लिए पहुंचाना हो आसान नहीं होता।

पहाड़ मे रहने वाले उसके साथ जीने वाली जनता इसे आसानी से समझती हैं.. लेकिन जिस कैकई विलाप वाले तबके को दूर के ढोल सुहावने लगते हों, वो शायद इसका अहसास कभी नहीं कर सकता । पहाड़ को पर्यटन का बेहतरीन ठिकाना समझने वाले पहाड़ में देवदर्शन की तपस्या के बीच का फर्क महसूस नहीं कर सकते। शायद यही वजह है कि चार धाम यात्रा में जरा सी भी चूक पर बंवडर मचाया जा रहा है।

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जो उत्तराखंड विकास की प्रसव पीड़ा से गुजर रहा हो वहां सफर के दौरान थोड़ी बहुत तकलीफ होना लाजमि है। अगर इस दिक्कत को तमाशा बना दिया तो क्या देवदर्शन किए और क्या यात्रा की। जरा सोचिए जब हम किसी काम की शुरूआत करते हैं तो कितनी तकलीफ का सामना करते हैं नर्सरी के बच्चे को अ लिखवाने में बच्चे को भी, अभिभावक को भी और टीचर को भी तकलीफ होती है।

बावजूद इसके कोई हाईपर नहीं होता क्योंकि गुस्सा करेंगे तो एक नहीं कई दुष्परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। जब हम घर बनाते हैं तो बुनियाद से लेकर छत और दरवाजों से लेकर रंगाई पुताई तक कितने काम छूट जाते हैं लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं होता कि हम मकान को ही छोड़ दें या इसे बेकार मनहूस बता दें। हम उन कमियों को दूर करने की कोशिश करते हैं। ताकि मकान मनमाफिक बन सके।

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ऐसा ही उत्तराखंड की चार धाम यात्रा का भी है विकट भौगोलिक परिस्थिति और मौसम का पल- मे तोला पल में रत्ती वाला मिजाज भी सरकार और सिस्टम का इंम्तिहान लेता है। ऐसे में सरकार हो या सिस्टम हर कसौटी पर खरा उतरने की कोशिश करती है ताकि आने वाले श्रद्धालु को कोई तकलीफ न हो। हर ठोकर से सरकार सबक लेती है ।

लेकिन कैकई विलाप वाले अरबन नक्सल तबके को सरकार की कोशिश नहीं दिखती सिर्फ अपने लाईक्स और कमेंट दिखते हैं। फिर चाहे इसके लिए राज्य की उसके समाज की उसकी सरकार की और उसके सिस्टम की इमेज ही क्यों न धूमिल हो जाए। बेशक संत कबीरदास जी ने कहा हो कि “निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।” बावजूद इसके उन्होंने नजदीक रखने की बात कही थी, बदनामी के लिए प्रचार करने की नहीं।