स्वास्थ्य विभाग खुद वेंटिलेटर पर, खबरें चीखती है और अफसर मुस्कुराते है…! शायद खबरों से नहीं पड़ता जैसे सिस्टम को कोई असर…

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देहरादून। उत्तराखंड का स्वास्थ्य महकमा इन दिनों मरीजों का इलाज कम और खुद अपने इलाज की जरूरत ज्यादा महसूस कर रहा है। हालात ऐसे हैं कि विभाग को देखने के बाद यही लगता है कि मरीज तो किसी तरह ऑक्सीजन पर चल रहा है, लेकिन पूरा सिस्टम खुद वेंटिलेटर पर पहुंच चुका है।
हैरानी की बात यह नहीं है कि स्वास्थ्य विभाग में अव्यवस्थाएं हैं। हैरानी की बात यह है कि इन अव्यवस्थाओं को लेकर खबरें छप रही हैं, चर्चाएं हो रही हैं, सवाल उठ रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अफसरों के चेहरे पर शिकन तक नहीं है। बल्कि बंद कमरों में बैठकर कुछ अधिकारी पूरे आत्मविश्वास के साथ यह कहते सुने जा सकते हैं कि “किसी के लिखने से क्या फर्क पड़ता है।” अब इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस विभाग का काम लोगों की सेहत सुधारना है, वहां के अधिकारी व्यवस्था की सेहत बिगड़ने पर भी निश्चिंत हैं। मानो विभाग का नया नारा हो – “सब चलता है, चलता रहेगा।”स्वास्थ्य विभाग में योजनाएं बनती हैं, फिर बदल दी जाती हैं। तबादले होते हैं, फिर संशोधित हो जाते हैं। आदेश जारी होते हैं, फिर नए आदेश पुराने आदेशों को निगल जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे विभाग कोई सरकारी संस्थान नहीं बल्कि प्रयोगशाला हो, जहां रोज नए-नए प्रयोग किए जा रहे हों। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां प्रयोगों का असर सीधे जनता पर पड़ता है। व्यवस्था पटरी पर आए, इसके लिए कम और व्यवस्था पटरी से उतरे तो उसकी वजह बताने वालों को नजरअंदाज करने की कला में विभाग ने महारत हासिल कर ली है। खबरें छपती हैं तो छपने दीजिए, सवाल उठते हैं तो उठने दीजिए, जनता परेशान होती है तो होती रहे। अफसरशाही के इस आत्मविश्वास को देखकर लगता है कि जवाबदेही शब्द अब सरकारी शब्दकोश से ही गायब हो चुका है। मजेदार बात यह है कि ऊंची इमारतों में बैठे अधिकारी नीचे के कर्मचारियों और अधिकारियों को अनुशासन और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। बैठकें होती हैं, समीक्षा होती है, निर्देश दिए जाते हैं और फटकार भी लगाई जाती है। लेकिन जब गड़बड़ी की जड़ खुद शीर्ष स्तर पर दिखाई देने लगे तो सवाल उठता है कि आखिर फटकार किसे लगाई जाए?

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स्वास्थ्य विभाग की हालत उस मरीज जैसी होती जा रही है जो डॉक्टर के पास इलाज कराने जाए और डॉक्टर खुद बेड पर भर्ती मिल जाए। जनता अस्पतालों में बेहतर सुविधाओं की उम्मीद लेकर जाती है, लेकिन विभागीय फैसलों और प्रशासनिक उठापटक को देखकर लगता है कि इलाज की जरूरत पहले सिस्टम को है।

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सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि खबरों, शिकायतों, जनप्रतिनिधियों की नाराजगी और जनता की परेशानियों से भी कोई फर्क नहीं पड़ता, तो फिर आखिर फर्क किससे पड़ेगा? क्या व्यवस्था के पूरी तरह चरमरा जाने का इंतजार किया जा रहा है? या फिर यह मान लिया गया है कि सरकारी सिस्टम का इंजन बिना जवाबदेही के भी चलता रहेगा?
फिलहाल तस्वीर यही कह रही है कि उत्तराखंड का स्वास्थ्य विभाग मरीजों को स्वस्थ बनाने की जद्दोजहद में लगा हो या न लगा हो, लेकिन खुद की सेहत को लेकर जरूर गंभीर नहीं दिख रहा। और जब महकमे आला अफसर ही यह मान ले कि जहाज में छेद होने की खबरों से कोई फर्क नहीं पड़ता, तब जहाज को किनारे कौन लगाएगा, यह सवाल सरकार के सामने खड़ा है।

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