देहरादून। नीट यूजी की दिव्यांग श्रेणी के तहत एमबीबीएस सीट पाने के लिए देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंचे कुछ अभ्यर्थी राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड की जांच में पूरी तरह फिट पाए गए हैं। आंखों से 40 से 50 प्रतिशत तक दिव्यांगता का दावा करने वाले ये सभी अभ्यर्थी अस्पताल में आसानी से छोटे-बड़े अक्षर पढ़ गए, जिसके बाद उनके प्रमाण पत्रों की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
दून मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एमएस डॉ. आर.एस. बिष्ट की अध्यक्षता में एक विशेष मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया था। इस बोर्ड में डॉ. विवेकानंद सत्यवली, डॉ. अनिल जोशी, डॉ. शांति पांडेय और डॉ. नितिन शर्मा को शामिल किया गया था, जिसके सामने उत्तराखंड के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र से आए 18 अभ्यर्थियों ने अपनी दिव्यांगता की जांच कराई।
जांच प्रक्रिया के दौरान कुल 18 में से 13 अभ्यर्थी पात्र पाए गए, जबकि 4 अभ्यर्थी मेडिकल जांच में फेल हो गए और एक अभ्यर्थी जांच के लिए पहुंचा ही नहीं। नेत्र रोग विभाग में तीन और हड्डी रोग विभाग में एक अभ्यर्थी के जांच में फेल होने से मेडिकल सर्टिफिकेट्स में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े की आशंका गहरी हो गई है।
महाराष्ट्र से ऑर्थो विभाग में जांच कराने पहुंची एक छात्रा ने अपने पैरों में 40% दिव्यांगता बताई थी, लेकिन दून अस्पताल की जांच में यह केवल 12% ही निकली। वहीं, यूपी से आई एक अन्य छात्रा ने 45% दिव्यांगता का दावा किया था, जिसकी शुरुआती जांच सामान्य पाई गई लेकिन बाद में वह अस्पताल से अचानक अनुपस्थित हो गई। कई अन्य अभ्यर्थी ऐसे भी थे जो कड़ाई से पूछताछ किए जाने पर बिना जांच पूरी कराए ही वहां से खिसक गए।
डॉक्टरों ने बताया कि जिन छात्रों ने खुद को 40 से 50 प्रतिशत तक दृष्टिबाधित बताया था, वे बिना किसी परेशानी के सभी अक्षर पढ़ रहे थे। आधुनिक मशीनों से कराई गई तकनीकी जांच में भी उनकी आंखों में किसी तरह की दिव्यांगता की पुष्टि नहीं हुई है।
जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद पात्र पाए गए शेष अभ्यर्थियों के वैध प्रमाण पत्र संबंधित पोर्टल पर अपलोड कर दिए गए हैं। ऑल इंडिया और स्टेट कोटे की काउंसलिंग से पहले सामने आए इस मामले ने उन मेडिकल बोर्ड्स और प्रक्रियाओं पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं जिनके जरिए ये फर्जी सर्टिफिकेट जारी किए गए थे।

