देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों मुद्दे बदल रहे हैं, तेवर बदल रहे हैं और अब लगता है कि राजनीति का अंदाज भी अपडेट हो गया है। सियासत में धरना, प्रदर्शन, नारेबाजी और आरोप-प्रत्यारोप तो पुराने हथियार हैं, लेकिन अब इसमें एक नया वेरिएंट जुड़ता दिखाई दे रहा है—“रोने का वेरिएंट!”
किच्छा में जिस तरह विधायक तिलक राज बेहड़ और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के बीच हाईवोल्टेज ड्रामा देखने को मिला, उसके बाद सियासत के गलियारों में एक नया सवाल तैर रहा है—नेता जी अब लड़ेंगे भी और रोएंगे भी? मामला किच्छा नगर पालिका चुनाव के स्ट्रांग रूम से जुड़ा है।
मतदान के बाद मतपेटियों को स्ट्रांग रूम में रखने के दौरान बाहर पर्दा लगाए जाने को लेकर विवाद शुरू हुआ। विधायक तिलक राज बेहड़ ने इसका विरोध किया और देखते ही देखते मामला इतना गरमा गया कि भाजपा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला भी मौके पर पहुंच गए।
दोनों पक्ष आमने-सामने आए, तीखी नोकझोंक हुई और फिर मामला धक्का-मुक्की और हाथापाई तक जा पहुंचा। स्थिति बिगड़ी तो पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा और लाठियां भी फटकारनी पड़ीं। लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू हुई। जिस राजनीति में नेता मंच से सीना ठोककर विरोधियों को ललकारते हैं, उसी राजनीति में किच्छा के घटनाक्रम ने कैमरों के सामने एक अलग ही तस्वीर पेश कर दी।
विधायक तिलक राज बेहड़ ने आरोप लगाया कि उनके साथ मारपीट हुई और उन्हें थप्पड़ मारा गया। जिसके बाद वह रोते बिलखते दिखाई दिए। उधर पूर्व विधायक राजेश शुक्ला भी धरने पर बैठ गए। मीडिया कैमरों के सामने उनका रोना धोना भी चर्चा का विषय बन गया। यानी किच्छा की सियासी पटकथा में एक तरफ नोकझोंक, दूसरी तरफ धरना और उसके बाद आंसुओं का ऐसा दृश्य कि सोशल मीडिया पर राजनीति के इस नए अंदाज की खूब चर्चा होने लगी।
अब इसे संयोग कहें या सियासी इत्तेफाक, लेकिन तस्वीर दिलचस्प जरूर है। एक ही घटनाक्रम, दो बड़े नेता और दोनों तरफ आंसुओं का सैलाब। सवाल यह भी है कि उत्तराखंड की राजनीति में आखिर हो क्या रहा है? क्या अब ताकतवर दिखने के लिए सिर्फ आवाज ऊंची करना काफी नहीं रहा? क्या धरने के साथ आंसू भी राजनीतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा बनते जा रहे हैं? या फिर कैमरे के सामने भावुक होना भी अब सियासी रणनीति का हिस्सा माना जाने लगा है?
हालांकि, किच्छा के पूरे घटनाक्रम में दोनों पक्षों की अपनी-अपनी शिकायतें और आरोप हैं। बेहड़ पक्ष ने थप्पड़ और बदसलूकी का आरोप लगाया, जबकि शुक्ला पक्ष ने भी मारपीट के आरोप लगाए। लेकिन राजनीति के लिहाज से तस्वीर ने एक अलग ही कहानी जरूर लिख दी है।
कभी नेता जनता के बीच ताकत दिखाते थे, अब कैमरे के सामने रोना धोना भी दिखा रहे हैं। किच्छा में पहले पर्दे को लेकर विवाद हुआ, फिर पर्दा उठा तो सियासत का दूसरा चेहरा सामने आ गया। पहले कहासुनी, फिर हाथापाई, फिर पुलिस की लाठी और आखिर में आंसू। यानी उत्तराखंड की राजनीति में अगर पुराने फॉर्मूले में धरना, नारे और आरोप शामिल थे, तो किच्छा के बाद इसमें एक नया अध्याय भी जुड़ता दिख रहा है—आंसुओं की राजनीति।
फिलहाल यह तय करना मुश्किल है कि इसे सियासत का दर्द कहें, विवाद का असर कहें या फिर राजनीति का नया वेरिएंट। लेकिन इतना जरूर है कि किच्छा का यह हाईवोल्टेज ड्रामा चुनावी विवाद से निकलकर अब ‘कौन कितना रोया’ वाली चर्चा तक पहुंच गया है। वहीं राजनीति के जानकारों के लिए यह सवाल सीधा है कि क्या उत्तराखंड की सियासत में अब भाषणों से ज्यादा आंसुओं का असर दिखाई देगा?

