दुनिया की सबसे दुर्गम और पवित्र मानी जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर बना संशय अब पूरी तरह समाप्त हो गया है। इस वर्ष यात्रा के लिए ऑनलाइन पंजीकरण 29 अप्रैल से आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से शुरू हो रहे हैं। यात्रा का पहला दल जून के पहले या दूसरे सप्ताह में रवाना होने की उम्मीद है। इस बार उत्तराखंड के पिथौरागढ़ स्थित लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथुला दर्रे दोनों मार्गों से श्रद्धालु पवित्र दर्शन के लिए जा सकेंगे। कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN) और विदेश मंत्रालय ने यात्रा की तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया है, जिससे शिवभक्तों में भारी उत्साह देखा जा रहा है।
पंजीकरण और यात्रा का कार्यक्रम
कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए इच्छुक श्रद्धालु बुधवार 29 अप्रैल से वेबसाइट पर अपना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। पिथौरागढ़ के लिपुलेख दर्रे से 10 दलों में कुल 500 यात्रियों को भेजने की योजना है, जबकि इतनी ही संख्या में श्रद्धालु सिक्किम के नाथुला दर्रे से भी यात्रा कर सकेंगे। यात्रा की सटीक तिथि और प्रति यात्री खर्च का विवरण कुमाऊं मंडल विकास निगम के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा।
समन्वय बैठक में बनी सहमति
हाल ही में नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय, ITBP, पिथौरागढ़ जिला प्रशासन और KMVN के अधिकारियों के बीच एक उच्चस्तरीय बैठक हुई। इस बैठक में यात्रा के संचालन, सुरक्षा और यात्रियों की सुविधाओं पर विस्तार से चर्चा की गई। KMVN के प्रभारी एमडी ने बताया कि पिछली यात्राओं की कमियों को दूर कर लिया गया है और वेबसाइट खुलने के साथ ही दलों की रवानगी की तारीखें भी सार्वजनिक कर दी जाएंगी।
लिपुलेख मार्ग का महत्व और इतिहास
पिथौरागढ़ का लिपुलेख दर्रा कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है। KMVN साल 1981 से इस यात्रा का सफल आयोजन कर रहा है। आंकड़ों के अनुसार, अब तक लगभग 18 हजार से अधिक भक्त इस मार्ग से कैलाश पर्वत के दर्शन कर चुके हैं। कोविड काल के बाद लंबे समय तक बंद रही यह यात्रा अब नए सुरक्षा मानकों और बेहतर बुनियादी ढांचे के साथ संचालित की जा रही है।
धार्मिक आस्था का केंद्र: पवित्र कैलाश
तिब्बत के दक्षिण-पश्चिम में 21,778 फीट की ऊंचाई पर स्थित कैलाश पर्वत हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों के लिए परम आस्था का केंद्र है। इसे भगवान शिव का निवास स्थान और मानसरोवर झील को प्रेम का कुंड माना जाता है। इस दुर्गम यात्रा का अनुभव श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, यही कारण है कि हर साल हजारों भक्त इस कठिन मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।

