सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि किसी भी धार्मिक संस्था के पास प्रबंधन का अधिकार होने का यह अर्थ कतई नहीं है कि वहां कोई नियम या ढांचा न हो। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक संस्थाओं के कामकाज में एक व्यवस्थित प्रक्रिया होनी चाहिए ताकि वहां अराजकता की स्थिति उत्पन्न न हो। नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने केरल के सबरीमाला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। शीर्ष अदालत ने जोर देकर कहा कि व्यापक संवैधानिक मानकों के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता और हर संस्था के लिए नियम होना अनिवार्य है।
प्रबंधन का अधिकार और संवैधानिक सीमाएं
जस्टिस अमानुल्लाह ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रबंधन का अधिकार किसी संस्था को नियमों से ऊपर नहीं रखता। उन्होंने स्पष्ट किया कि इबादत का एक तरीका और कार्यों के संपादन का एक निश्चित क्रम होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से चीजें तय नहीं कर सकता, बल्कि एक शासी निकाय होना आवश्यक है जो नियमों का विनियमन करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई भी धार्मिक संस्था संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकती।
धार्मिक स्थलों पर भेदभाव और सबरीमाला मामला
संविधान पीठ उन याचिकाओं पर गौर कर रही है जो विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से संबंधित हैं। इसमें सबरीमाला मंदिर का उदाहरण भी सामने आया, जहां 2018 में कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। कोर्ट अब इन मानदंडों को तय करने की कोशिश कर रहा है कि किसी धार्मिक प्रथा को ‘आवश्यक’ या ‘गैर-आवश्यक’ घोषित करने का कानूनी आधार क्या होना चाहिए।
दरगाह और सूफी परंपराओं पर दलीलें
सुनवाई के दौरान हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़े वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी के वकील ने दलील दी कि दरगाहों में प्रवेश को विनियमित करना प्रबंधन का हिस्सा है। उन्होंने चिश्तिया और अन्य सूफी परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि ये व्यवस्थाएं एक विशिष्ट धार्मिक संप्रदाय से जुड़ी हैं। इस पर कोर्ट ने दोहराया कि चाहे मंदिर हो या दरगाह, हर जगह एक जवाबदेह व्यवस्था होनी चाहिए जिसे कोई न कोई विनियमित करे, ताकि हर कोई अपनी मर्जी से बिना किसी नियंत्रण के कार्य न कर सके।

