उत्तराखंड के चारो धाम आजकल देवताओं के जयकारों से गूंज रहे है..ग्रीष्मकाली यात्रा अपने पूरे रंग में दिखाई दे रही है। पूरे देश से श्रद्धालु धामो की ओर बढ़ रहे हैं। श्रद्धा और सुकून के इस माहौल में एक तबका ऐसा भी है जो राह के मामूली कंकण को सरकार की लापरवाही का बोल्डर करार दे रहा है।
वो तबका है जिसने कभी शादी का शामियाना लगाना तो छोड़िए, लगते हुए भी नहीं देखा होगा, बावजूद इसके, शीतकाल के बाद ग्रीष्मकालीन चारधाम यात्रा से ग्राउड जीरो रिपोर्ट सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर जारी करना उसका शगल रहता है। ये तबका आधे भरे गिलास को आधा खाली है के नजरिए से देखता है लिहाजा उसे कदम-कदम पर कमिया दिखाई देती हैं।
बहरहाल व्यापक दृष्टिकोण से चारधाम यात्रा कर लौटे श्रद्धालु अच्छा फीडबैक दे रहे हैं।इसमें हिंदी सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री दीप्ती भटनागर भी शामिल हैं और चिकित्सा के पेशे से जुड़े डाक्टर अमित जैसे श्रद्धालु भी हैं। जिनका नजरिया आईने की तरह बिल्कुल साफ है। जो मामूली दिक्कत को हव्वा नहीं बनाते।
ये वो लोग हैं जिनसे उस तबके को सीखना चाहिए कि मामूली परेशानी को सुनामी की तरह पेश करते हैं। खैर बीते दिनो अभिनेत्री दीप्ति भटनागर ने चार धाम यात्रा के इंतजामो को बेहतर करार दिया था। वहीं चिकित्सक डॉक्टर अमित कहते हैं राज्य सरकार ने चार धाम यात्रा में श्रद्धालुओं की हिफाजत के लाजवाब इंतजाम किए हैं।
स्क्रीनिंग हो रही है अच्छी दवा मुहैया करवाई जा रही हैं सेहत की जांच के बाद उन्हें अच्छी सलाह दी जा रही है। जिन श्रद्धालुओं के जिस्म हाई एल्टीट्यूड की आबोहवा को झेल सकते हैं उन्हें यात्रा के लिए ओके किया जा रहा है और जिनके शरीर हवा के दबाव, आक्सीजन की कमी को नहीं झेल पाएंगे उन्हें न जाने की सलाह दी जा रही है। बावजूद जिद्दी भक्त नहीं मान रहे हैं तो उसमें कोई क्या कर सकता है।
सूत्रों की माने तो कुछ भक्त ऐसे भी हैं जो उम्र के आखिरी पड़ाव से गुजर रहे हैं और मोक्ष की ख्वाहिश में चारधाम यात्रा कर रहे हैं। जिनकी धारणा है कि देवभूमि देवदशर्न की यात्रा में प्राण त्यागने का मतलब सीधा स्वर्ग जाना होता है। लिहाजा ऐसे भक्त सरकारी इंतजामात को चकमा देकर यात्रा पथ पर बढ़ रहे हैं। उन्हे उत्तराखंड सरकार की छवि से कोई लेना देना नहीं, उन्हें वास्ता है तो अपने मोक्ष की धारणा से। इस तबके के दोनो हाथों में लड्डू हैं देवदर्शन कर जीवित लौटे तो “सौभाग्य” और यात्रा पथ पर प्राण त्याग दिए तो “अहोभाग्य”।
लेकिन जो कैमरे वाले भक्तों की इस दबी हुई धारणा से बेखबर हैं वे सरकार के इंतजामो को नाकाफी बताकर कपड़े फाड़ने पर ऊतारु हैं। उधर सवाल कम्यूनिकेशन का भी है विविध भाषाओं वाले भारत देश में देवताओं पर सबकी श्रद्धा एक सी है। लिहाजा सरकार के सामने भाषा की भी चुनौती है। जिससे निपटने के लिए सरकार को कोई कारगर कदम उठाना होगा ताकि आने वाले वक्त में कोई दिक्कत न हो।
वैसे फीडबैक देने वालों ने वीआईपी कल्चरल को आड़े हाथ लिया है। उनका मानना है कि जब राज्य का मुख्यमंत्री दूसरे भक्तों के साथ कतार में खड़े होकर देव दर्शन के लिए अपनी बारी के इंतजार में खड़ा रह सकता है तो दूसरे रसूखदार क्यों नहीं देवदर्शन की तपस्य़ा कर सकते। उन्हें सिस्टम तोड़ने के लिए क्यों फुसलाया जाता है या वे अपनी श्रद्धा को अपनी पॉवर के तराजू पर तौल कर उसका वजन कम क्यों कर देते हैं। भगवान के सामने क्या रूआब दिखाना । कहा जा रहा है कि धामों में सबसे ज्यादा दिक्कत इसी वीआईपी कल्चर से होती है। जब सरकारी इतंजाम पर श्रद्धा से कही ज्यादा रुतबा हावी हो जाता है।
बहरहाल अब तक की यात्रा में जो कुछ भी अव्यवस्था का हल्ला मचाया जा रहा है उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि कही भक्तो की ज़िद है तो कहीं विपरीत भौगौलिक परिस्थितियां । हालांकि आने वाले कल में, बर्फीली देवभूमि की यात्रा सुगम और सरल की कोशिश में जुटी राज्य सरकार को, मौजूदा वक्त में तानो का सामना करना पड़ रहा है।
तय है कि हो हल्ला करने वाले तबके को धामों की राह मे सोए हुए हिमखंड नहीं दिखे होंगे , जिन्हें हटाना लोहे के चने चबाना जैसा था, बावजूद इसके मजबूत इरादों से उन्हें हटाया गया, ताकि श्रद्धा के चिराग रोशन रहें। तो अच्छे कल की उम्मीद में विकास की प्रसव पीड़ा से गुजरता पहाड़ भी आधा गिलास खाली देखने वालों ने नहीं देखा होगा। हालांकि हमें उम्मीद है कि आने वाले वक्त में अव्यवस्थाओं का किस्सा सुनाने वालों का नजरिया जरूर बदलेगा।

