सुप्रीम कोर्ट ने किसी मरीज को ‘ब्रेन डेड’ घोषित करने की वर्तमान प्रक्रिया में सुधार और पारदर्शिता लाने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की है। अदालत ने संकेत दिया है कि वह इस संवेदनशील प्रक्रिया की समीक्षा के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दे सकता है। यह मामला केरल हाई कोर्ट के 2017 के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है, जिसमें मरीज को मृत घोषित करने के लिए अधिक पुख्ता और वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता से लिखित सुझाव मांगे हैं।
प्रक्रिया में गड़बड़ी और सुधार की मांग
याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने यह गंभीर मुद्दा उठाया है कि वर्तमान में किसी मरीज को ‘ब्रेन डेड’ घोषित करने की प्रक्रिया में कथित तौर पर खामियां और धांधली हो रही है। उनका तर्क है कि जब किसी का जीवन दांव पर हो, तो उसे मृत घोषित करने के लिए केवल औपचारिकताएं काफी नहीं हैं, बल्कि इसके लिए सत्यापन योग्य और ठोस प्रमाण अनिवार्य होने चाहिए।
अनिवार्य तकनीकी परीक्षण का सुझाव
मरीज की स्थिति का सटीक आकलन करने के लिए याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया है कि केवल सामान्य परीक्षणों के बजाय एंजियोग्राफी और ईईजी (इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राम) जैसे उन्नत परीक्षण अनिवार्य किए जाने चाहिए। इन परीक्षणों के माध्यम से मस्तिष्क में रक्त के प्रवाह और विद्युत गतिविधियों की सटीक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी, जिससे किसी भी तरह की मानवीय चूक या जल्दबाजी की संभावना कम हो जाएगी।
एम्स की विशेषज्ञ समिति करेगी परीक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्ताव दिया है कि एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई जाए। यह कमेटी याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए तकनीकी सुझावों का बारीकी से परीक्षण करेगी और अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत को सौंपेगी। इस रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में ‘ब्रेन डेड’ घोषित करने के नियमों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जिससे चिकित्सा क्षेत्र में जवाबदेही और बढ़ेगी।

