हिमालय में 2010 के बाद बदला आपदा पैटर्न, बिना भूकंप दरक रहे पहाड़

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देहरादून। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में अब बिना किसी बड़े भूकंप या भूगर्भीय हलचल के पहाड़ दरक रहे हैं, जिससे प्राकृतिक आपदाओं का पैटर्न तेजी से बदल गया है। दून विश्वविद्यालय और आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों के संयुक्त अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2010 के बाद से राज्य की प्रमुख नदी घाटियों में भूस्खलन की घटनाओं में दोगुनी से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे चारधाम यात्रा मार्गों और स्थानीय बस्तियों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

अध्ययन के अनुसार, साल 2010 से पहले उत्तराखंड में बड़े भूकंप ही भूस्खलन के मुख्य कारण हुआ करते थे। इनमें अलकनंदा-मंदाकिनी घाटी में 1999 का चमोली भूकंप और भागीरथी-यमुना घाटी में 1991 का उत्तरकाशी भूकंप (6.6 तीव्रता) शामिल हैं। इन भूकंपों के बाद लंबे समय तक भूगर्भीय अस्थिरता बनी रहती थी, लेकिन अब बिना किसी भूकंपीय झटकों के भी पहाड़ तेजी से धंस रहे हैं।

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वैज्ञानिक शोध के आंकड़े बेहद चिंताजनक स्थिति बयां कर रहे हैं। अलकनंदा-मंदाकिनी घाटी में 1995 से 2010 के बीच 3,742 भूस्खलन दर्ज किए गए थे, जो 2010 के बाद बढ़कर 5,759 हो गए। वहीं भागीरथी-यमुना घाटी में 2010 से पहले के 15 वर्षों में 1,461 भूस्खलन हुए थे, जिनकी संख्या 2010 के बाद बढ़कर 2,890 तक पहुंच गई। यानी दोनों प्रमुख घाटियों में भूस्खलन की घटनाएं दोगुनी से अधिक हो चुकी हैं।

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दून विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. विपिन कुमार ने बताया कि बारिश का बदलता पैटर्न, अनियंत्रित निर्माण कार्य और अत्यधिक पर्यटन का दबाव हिमालय को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है। इन मानवीय और पर्यावरणीय कारकों की वजह से भविष्य में केदारनाथ जैसी बड़ी प्राकृतिक त्रासदी का खतरा और अधिक गंभीर रूप ले सकता है।

स्टडी में यह चेतावनी भी दी गई है कि चारधाम से जुड़ी प्रमुख नदी घाटियों में भूस्खलन से प्रभावित क्षेत्र हर साल औसतन 1.82 वर्ग किलोमीटर की दर से बढ़ रहा है। इसका सीधा मतलब है कि पहाड़ अपनी प्राकृतिक मजबूती खो रहे हैं और नए संवेदनशील क्षेत्र लगातार विकसित हो रहे हैं।

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बढ़ते खतरे को देखते हुए वैज्ञानिकों के शोध दल ने सरकार को तुरंत कड़े कदम उठाने का सुझाव दिया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अति-संवेदनशील नदी घाटियों की ओर हो रहे मानव पलायन को रोका जाए। इसके साथ ही, किसी भी नई विकास परियोजना को मंजूरी देने से पहले दीर्घकालिक आपदा जोखिम आकलन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।