देहरादून। आपदा प्रबंधन विभाग ने चमोली स्थित सरस्वती ताल और उत्तरकाशी स्थित केदारताल के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए विशेषज्ञों के दल को रवाना कर दिया है। सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन ने इस संयुक्त टीम को हरी झंडी दिखाई। यह टीम अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित इन दोनों संवेदनशील झीलों के जलस्तर, आकार और आसपास के भू-भाग में हो रहे बदलावों का सटीक आकलन करेगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि प्रदेश की सभी संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का व्यापक अध्ययन कराया जा रहा है। इसका मकसद झीलों की वर्तमान स्थिति को समझना और भविष्य में ग्लेशियर टूटने या झील फटने जैसे संभावित खतरों का समय रहते पता लगाना है, ताकि किसी भी आपदा को रोका जा सके।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि खतरे की स्थिति में निचले इलाकों तक समय पर चेतावनी पहुंचाना सबसे जरूरी है। इसके लिए झीलों पर आधुनिक सेंसर, ऑटोमैटिक वॉटर लेवल मीटर और एडवांस संचार प्रणाली लगाई जाएगी। इस तकनीक की मदद से आपात स्थिति में तुरंत राहत और बचाव कदम उठाए जा सकेंगे।
आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक ने बताया कि ग्लेशियर झीलों से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए जोखिम न्यूनीकरण योजना पर काम चल रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर वहां सुरक्षित निकासी मार्ग, अलर्ट सिस्टम और स्थानीय स्तर पर आपातकालीन तैयारी को मजबूत किया जा रहा है।
आपदा प्रबंधन मंत्री के अनुसार, राहत और बचाव दलों की तैयारियों को इस तरह ढाला जा रहा है कि किसी भी चेतावनी के मिलते ही प्रभावित आबादी को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके और जन-धन की हानि को रोका जा सके।
सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन ने बताया कि उत्तराखंड में 13 ग्लेशियर झीलों को अति-संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इनमें से 4 झीलों का सर्वे पूरा हो चुका है, जबकि बाकी झीलों का अध्ययन चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है।
इसी अभियान के तहत चमोली की सरस्वती ताल और उत्तरकाशी की केदारताल के बैथीमेट्री सर्वे के लिए टीम भेजी गई है। यह टीम झीलों की गहराई, पानी की क्षमता और निचले इलाकों पर पड़ने वाले असर की वैज्ञानिक जांच करेगी।
भौगोलिक चुनौती का जिक्र करते हुए सचिव ने बताया कि सरस्वती ताल करीब 5,700 मीटर और केदारताल 4,750 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं। इतनी कठिन और विषम परिस्थितियों में यह वैज्ञानिक अध्ययन आपदा प्रबंधन की दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है।
विशेषज्ञ दल की रवानगी के दौरान राज्य सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष विनय रुहेला और सेवानिवृत्त ले. कर्नल रघुवीर सिंह भण्डारी ने टीम को शुभकामनाएं दीं। इस मौके पर एसीईओ क्रियान्वयन, डीआईजी राजकुमार नेगी और जेसीईओ दिनेश कुमार पुनेठा सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
इस अभियान में देश के अग्रणी वैज्ञानिक संस्थानों और सुरक्षा बलों की संयुक्त टीम शामिल है। इसमें राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA), ULMMC, बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) लखनऊ, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (NIH) रुड़की, SDRF, NDRF और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (NIM) के विशेषज्ञ मिलकर काम कर रहे हैं।
यह बहुआयामी अध्ययन झीलों की स्थिति और उनके व्यवहार को हर पहलू से समझने में मदद करेगा। विभिन्न वैज्ञानिक विधाओं के एक साथ आने से झीलों के आंकड़ों का सटीक विश्लेषण संभव हो पाएगा।
इस कठिन सर्वे अभियान में USDMA के रोहित कुमार व निखिल पुनिया, ULMMC के डॉ. विशाल व दीपक भट्ट, BSIP लखनऊ के डॉ. शेख नवाज अली, शुभजीत घोष व प्रकाश रंजन जेना, और वाडिया संस्थान की डॉ. पिंकी बिष्ट, स्वप्निल बिष्ट व शिव्यांक सिंह नेगी मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।

