उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने देहरादून के मियांवाला क्षेत्र में तालाब और सरकारी जलमग्न भूमि पर किए गए अवैध अतिक्रमण के मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जिलाधिकारी देहरादून को कड़े निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए बिंदुओं की गंभीरता से जांच की जाए और अगले तीन महीनों के भीतर इस पूरे मामले पर कानूनी रूप से उचित निर्णय लेकर अतिक्रमण हटाया जाए। इस कदम का उद्देश्य प्राकृतिक जल निकायों को उनके मूल स्वरूप में बहाल करना है।
तालाब और जलमग्न भूमि को बचाने की मुहिम
यह मामला मियांवाला ग्राम पंचायत भवन के पास स्थित हरिद्वार रोड की ग्राम समाज भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ता महेंद्र सिंह बटोला ने खसरा संख्या 407क, 413, 414, 535घ और 536 की पहचान कर इन जमीनों का सीमांकन करने की मांग की थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन महत्वपूर्ण प्राकृतिक जल स्रोतों पर अवैध निर्माण और बदलाव कर उन्हें नुकसान पहुँचाया गया है, जिससे क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है।
मूल स्थिति में बहाली और जैव-विविधता का संरक्षण
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि वह चिन्हित भूमि से सारा मलबा हटाए और अतिक्रमणों को ध्वस्त कर इसे फिर से एक प्राकृतिक जल निकाय (Natural Water Body) के रूप में विकसित करे। याचिकाकर्ता की मुख्य मांग यह है कि प्राकृतिक जल प्रवाह को पुनः स्थापित किया जाए और क्षेत्र की जैव-विविधता का संरक्षण किया जाए, ताकि यह जल निकाय अपने पुराने प्राकृतिक स्वरूप में वापस लौट सके और पर्यावरण को लाभ मिले।

