दूनघाटी को सन् 1989 में इको सेंसिटिव जोन घोषित किया गया था। लेकिन आलम ये है कि 37 साल बाद भी दून घाटी के विकास का मास्टर प्लान नहीं बना। इन बीते सालों में बेधड़क बेहिसाब अनियोजित विकास हुआ जिसका खामियाजा अब अलग राज्य उत्तराखंड भुगत रहा है। दरअसल 1989 में पर्यावरण मंत्रालय ने एक शासनादेश जारी कर दून घाटी को इको सेंसटीव जोन घोषित किया था। जिसके तहत दून घाटी का विकास ईको सेंसटिव जोन के तय मानको पर ही होना था। लेकिन हुआ नहीं जिस पर अब हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है.।
वरिष्ठ न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायाधीश राकेश थपलियाल की खंडपीठ ने सरकार से प्रगति रिपोर्ट तलब करते हुए पूछा है कि देहरादून के लिए मास्टर प्लान तैयार करने और पर्यटन विकास योजना बनाने की दिशा में अब तक क्या प्रगति हुई है।दरअसल देहरादून निवासी आकाश वशिष्ठ ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि केंद्र सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने वर्ष 1989 में दूनघाटी को इको सेंसिटिव जोन घोषित किया था। शासनादेश में साफ निर्देश था कि देहरादून को पर्यटन विकास की अवधारणा के अनुरूप विकसित किया जाए और अनियोजित निर्माण पर रोक लगाई जाए. लेकिन 34 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस शासनादेश को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया. शहर में अनियोजित और अनियमित विकास कार्य लगातार जारी हैं.।
सुनवाई के दौरान माननीय न्यायालय ने कहा कि, इको सेंसिटिव जोन के मानकों की अनदेखी के कारण ही देहरादून में बाढ़, भूस्खलन और पर्यावरणीय संकट बढ़ रहा है। वही फ्लाईओवर पर भी न्यायालय ने सवाल उठाते हुए शहरी विकास सचिव को तलब किया है कि बल्लवीवाला और आईएसबीटी फ्लाईओवर का निर्माण किस स्वीकृत मानचित्र के आधार पर किया गया। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि स्वीकृत नक्शे के अनुरूप निर्माण नहीं होने और डिजाइन संबंधी खामियों के कारण ही फ्लाईओवर जनता के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। कोर्ट ने पूर्व में दिए गए अपने निर्देशों का भी उल्लेख किया है जबकि राज्य सरकार से चार बिंदुओं पर जवाब मांगा है।
माननीय न्यायालय ने पूछा कि 1989 के शासनादेश के बाद देहरादून का मास्टर प्लान क्यों नहीं बना?इको सेंसिटिव जोन के मानकों के तहत पर्यटन विकास योजना पर अब तक क्या काम हुआ? साथ ही बल्लवीवाला और आईएसबीटी फ्लाईओवर किस पर्यावरणीय मंजूरी से बने? साथ ही साथ अनियोजित विकास रोकने के लिए सरकार ने क्या ठोस कदम उठाए?
आकाश वशिष्ठ ने याचिका में कहा कि दूनघाटी देश के चुनिंदा इको सेंसिटिव जोन में शामिल है. यहां साल, शीशम, खैर जैसे मूल्यवान वन हैं. आसन बैराज और झाझरा जैसे वेटलैंड हैं. लेकिन बिल्डर लॉबी और अनियोजित शहरीकरण के कारण पहाड़ियों की कटाई, नदी-नालों पर अतिक्रमण और ग्रीन बेल्ट का उजड़ना जारी है। 1989 के शासनादेश में ऊंची इमारतों, बड़े उद्योगों और खनन पर रोक की बात थी, पर जमीन पर कुछ नहीं हुआ.

