देहरादून। राज्य के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शुमार राजकीय दून मेडिकल कॉलेज एक बार फिर सुर्खियों में है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सुर्खियां किसी एक मामले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विवादों और सवालों की पूरी फेहरिस्त दिखाई दे रही है। कभी रैगिंग, कभी मेस से जुड़ी शिकायतें, कभी प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल तो कभी मेडिकल शिक्षा और दाखिले से जुड़े विवाद—दून मेडिकल कॉलेज का नाम लगातार खबरों में बना हुआ है।
हाल के महीनों में रैगिंग से जुड़े मामलों की जांच और कार्रवाई भी सामने आई है। सवाल यह है कि आखिर दून मेडिकल कॉलेज में ऐसा क्या हो रहा है कि छोटी से छोटी अव्यवस्था भी अब बड़ी खबर बनकर बाहर आ रही है? दरअसल, दून मेडिकल कॉलेज में अव्यवस्थाओं का इतिहास कोई नया नहीं है।
अस्पताल के मेडिकल कॉलेज के स्वरूप में आने के बाद से ही व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए, जो संस्थान की चारदीवारी से बाहर निकलने से पहले ही दब जाते थे या फिर सुर्खियों तक नहीं पहुंच पाते थे। अब तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। एक के बाद एक शिकायतें सामने आ रही हैं और उनके साथ मीडिया की सुर्खियां भी जुड़ती जा रही हैं।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वास्तव में व्यवस्था पहले से ज्यादा खराब हुई है या फिर अब दून मेडिकल कॉलेज के भीतर की हर छोटी-बड़ी बात बाहर तक पहुंचाने का कोई नया तंत्र सक्रिय हो गया है? और यहीं से कहानी का सबसे दिलचस्प सवाल सामने आता है—क्या यह सिर्फ बदहाल व्यवस्था की तस्वीर है या फिर किसी बड़ी कुर्सी की लड़ाई का साइड इफेक्ट? मेडिकल कॉलेज से जुड़े सूत्रों का दावा है कि संस्थान की एक अहम प्रशासनिक कुर्सी को लेकर अंदरखाने खींचतान चल रही है और इसी क्रम में व्यवस्थाओं से जुड़ी शिकायतों को लगातार उछाले जाने की चर्चा है।
हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि यदि ऐसा कोई प्रयास हो रहा है तो इसके पीछे कौन है और उसका वास्तविक उद्देश्य क्या है। लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है। अगर व्यवस्थाएं वास्तव में खराब हैं तो उनकी शिकायतें सामने आना और उन पर कार्रवाई होना जरूरी है। आखिर मरीजों, छात्रों और चिकित्सकों से जुड़ा संस्थान किसी भी तरह की लापरवाही का प्रयोगशाला नहीं बन सकता।
दूसरी तरफ यदि छोटी-छोटी कमियों को जानबूझकर बड़ा बनाकर किसी अधिकारी या व्यवस्था विशेष को निशाना बनाने की कोशिश हो रही है, तो यह भी कम गंभीर विषय नहीं है।क्योंकि मेडिकल कॉलेज की छवि सिर्फ एक अधिकारी या एक कुर्सी की छवि नहीं होती। यहां मरीजों का भरोसा, छात्रों का भविष्य और सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था की साख सीधे जुड़ी होती है।
ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हर शिकायत की निष्पक्ष जांच हो। जो गड़बड़ी है, उस पर कार्रवाई हो और जो सिर्फ विवाद पैदा करने की कोशिश है, उसकी भी पड़ताल हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि दून मेडिकल कॉलेज की छोटी-छोटी अव्यवस्थाओं को बड़ी-बड़ी सुर्खियों में बदलने के पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है? हालांकि अब इस सवाल का जवाब सिर्फ चर्चाओं से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।

