देहरादून। देहरादून नगर निगम ने आर्थिक अनुशासन बनाने और गैर-जरूरी खर्चों पर लगाम लगाने के लिए बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। निगम प्रशासन ने फील्ड ड्यूटी में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों को उपलब्ध कराई गईं 18 गाड़ियां वापस ले ली हैं। इसके साथ ही किराए पर ली जाने वाली टैक्सियों की संख्या 32 से घटाकर सीधे 14 कर दी गई है। इस कटौती से नगर निगम को हर साल करीब ₹1 करोड़ 26 लाख की बड़ी बजटीय बचत होगी।
नगर आयुक्त आलोक कुमार पांडे ने किराए के वाहनों पर हो रहे बेतहाशा खर्च को रोकते हुए यह नई व्यवस्था तुरंत प्रभाव से लागू कर दी है। पूर्व में स्वास्थ्य अनुभाग के अधिकारियों को आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से गाड़ियां दी गई थीं, ताकि सफाई व्यवस्था सुधारे जाए। हालांकि, लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी धरातल पर सफाई व्यवस्था में कोई खास सुधार नहीं दिखा, जिसके बाद यह सख्त फैसला लिया गया।
नई गाइडलाइन के तहत नगर निगम के पास मौजूद 9 राजकीय वाहनों को अब ‘पूल सिस्टम’ के जरिए चलाया जाएगा। अतिक्रमण हटाने या चेकिंग अभियान जैसे अति-आवश्यक कार्यों के लिए जरूरत पड़ने पर ही अफसरों को वाहन उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके अलावा फील्ड स्टाफ को उनके वेतन स्तर के हिसाब से प्रतिमाह वाहन रखरखाव भत्ता दिया जाएगा।
शासनादेश के अनुसार तय किए गए नए वाहन भत्ते के तहत लेवल 1 से 3 के कर्मचारियों को ₹1,200 और लेवल 4 से 6 वालों को ₹2,000 दिए जाएंगे। वहीं, लेवल 7 से 9 के अधिकारियों को ₹3,000 और लेवल 10 से ऊपर के वरिष्ठ अधिकारियों को ₹4,000 प्रतिमाह वाहन भत्ता मिलेगा।
गाड़ियों में कटौती के साथ-साथ नगर निगम ने कूड़ा निस्तारण करने वाली निजी कंपनियों पर भी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। शीशमबाड़ा और सहस्रधारा डंपिंग साइट्स पर कूड़ा निस्तारण में कंपनियों की लापरवाही के चलते निगम पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। एनजीटी और अदालतों में मुकदमों की सुनवाई पर भी हर महीने लाखों रुपये पानी की तरह बह रहे हैं।
सालों से कोर्ट में मामले लंबित होने और हलफनामा देने के बावजूद काम में सुधार न करने वाली कंपनियों के खिलाफ निगम अब कड़ा रुख अपना रहा है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, सिर्फ मुनाफा कमाने में जुटी ऐसी लापरवाह एजेंसियों को नगर निगम जल्द ही बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी में है।

