Dehradun: 16 करोड़ के पुल पर ‘हंगामा’ या राजनीति? एप्रोच रोड टूटी, सोशल मीडिया ने बता दिया पुल ध्वस्त

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देहरादून। उत्तराखंड में बरसात और सड़क-पुलों को होने वाला नुकसान कोई नई बात नहीं है। हर मानसून में कहीं सड़क धंसती है, कहीं एप्रोच रोड कट जाती है तो कहीं भू-स्खलन यातायात की रफ्तार रोक देता है। लेकिन इस बार देहरादून के प्रेमनगर स्थित नंदा की चौकी में करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से बने पुल को लेकर सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीर पेश की गई, मानो पूरा पुल ही धराशायी हो गया हो।

हकीकत इससे अलग है। मौके की जानकारी के अनुसार, पुल सुरक्षित है, जबकि तेज बारिश के चलते पुल की एप्रोच रोड का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर वायरल हुए कई वीडियो और पोस्ट में इसे “16 करोड़ का पुल टूट गया” बताकर प्रसारित किया गया। देखते ही देखते यह मामला चर्चा का विषय बन गया और निर्माण गुणवत्ता से लेकर सरकारी कार्यप्रणाली तक पर सवाल उठने लगे।

सवाल यह है कि क्या एप्रोच रोड के क्षतिग्रस्त होने और पूरे पुल के ध्वस्त होने में कोई अंतर नहीं है? तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि पुल और उसकी एप्रोच रोड दो अलग-अलग संरचनाएं हैं। एप्रोच रोड का क्षतिग्रस्त होना निश्चित रूप से गंभीर मामला है और इसकी जांच होनी चाहिए, लेकिन इसे पूरे पुल के गिरने के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यों की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

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राजनीतिक माहौल के बीच इस घटना ने एक बार फिर सोशल मीडिया की भूमिका पर बहस छेड़ दी है। चुनावी मौसम नजदीक आते ही छोटी घटनाएं भी बड़े राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाती हैं। समर्थक और विरोधी दोनों पक्ष अपने-अपने नजरिए से तस्वीर पेश करते हैं। ऐसे में तथ्य अक्सर शोर-शराबे के बीच दब जाते हैं।

इस पूरे प्रकरण का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी नई परियोजना की एप्रोच रोड पहली ही बारिश में क्षतिग्रस्त होती है, तो निर्माण एजेंसी, डिजाइन, ड्रेनेज व्यवस्था और गुणवत्ता नियंत्रण पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जनता के पैसे से बने किसी भी निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर जवाबदेही तय होना आवश्यक है। इसलिए केवल वायरल पोस्ट को गलत बताना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि संबंधित विभाग तकनीकी निरीक्षण कर स्पष्ट करे कि नुकसान क्यों हुआ और मरम्मत कब तक पूरी होगी।

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बाईट :- क्षेत्राधिकारी नगर, देहरादून

उत्तराखंड का इतिहास बताता है कि प्राकृतिक आपदाओं ने कई बार मजबूत दिखने वाले ढांचों को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। वर्ष 2012 में उत्तरकाशी की अस्सी गंगा घाटी में बादल फटने और अचानक आई बाढ़ से कई मोटर और पैदल पुल बह गए, जिससे दर्जनों गांवों का संपर्क टूट गया। उसी वर्ष पौड़ी गढ़वाल के चौरास में निर्माणाधीन पुल ढहने से छह श्रमिकों की जान चली गई। इसके बाद 2013 की केदारनाथ आपदा ने पूरे राज्य को झकझोर दिया। रामबाड़ा पुल सहित अनेक पुल बह गए और लगभग 147 पुल तथा 1,300 से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त या नष्ट हो गईं। इन घटनाओं ने दिखाया कि प्राकृतिक आपदाओं के सामने आधारभूत ढांचे कितनी बड़ी चुनौती का सामना करते हैं।

हालांकि, हर घटना को प्राकृतिक आपदा बताकर जिम्मेदारी से बचा भी नहीं जा सकता। यदि कहीं निर्माण में लापरवाही हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं, यदि किसी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर या अधूरी जानकारी के आधार पर प्रस्तुत किया गया है, तो उससे भी बचना जरूरी है। लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन सवाल तथ्यों पर आधारित हों, यह उससे भी अधिक जरूरी है।

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सोशल मीडिया सूचना का सबसे तेज माध्यम बन चुका है। कुछ सेकंड का वीडियो और एक आकर्षक कैप्शन लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। ऐसे दौर में प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह समय पर सही जानकारी सार्वजनिक करे, जबकि नागरिकों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की जिम्मेदारी है कि किसी भी वायरल दावे को साझा करने से पहले उसकी पुष्टि करें।

प्रेमनगर का यह मामला केवल एक एप्रोच रोड या पुल का नहीं, बल्कि सूचना की विश्वसनीयता और सार्वजनिक जवाबदेही का भी है। एक ओर निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर पारदर्शी जांच आवश्यक है, तो दूसरी ओर अधूरी या भ्रामक जानकारी से बचना भी उतना ही जरूरी है। आखिरकार, सच वही है जो तथ्यों की कसौटी पर खरा उतरे—न कि केवल वायरल होने से सच मान लिया जाए।