आबकारी निरीक्षक प्रेरणा बिष्ट का जलवा! 6 महीने में 208 मुकदमे दर्ज, तस्करों के लिए बनीं सबसे बड़ा सिरदर्द…

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देहरादून। उत्तराखंड में अवैध शराब के कारोबार के खिलाफ आबकारी विभाग लगातार अभियान चला रहा है, लेकिन यदि देहरादून जिले के आंकड़ों पर नजर डालें तो एक नाम सबसे अलग और सबसे प्रभावशाली नजर आता है—आबकारी निरीक्षक प्रेरणा बिष्ट।

जनवरी 2026 से जून 2026 तक के छह महीनों में देहरादून जनपद में कुल 241 आबकारी मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 208 मामलों की कार्रवाई अकेले आबकारी निरीक्षक प्रेरणा बिष्ट के खाते में दर्ज है। यानी जिले की करीब 86 प्रतिशत कार्रवाई एक ही अधिकारी के नेतृत्व में हुई।

ये आंकड़े केवल एक अधिकारी की सक्रियता नहीं, बल्कि उनके कार्य करने की शैली और प्रतिबद्धता को भी दर्शाते हैं। जब जिले में कई आबकारी निरीक्षक तैनात हैं, तब एक अधिकारी द्वारा इतनी बड़ी संख्या में कार्रवाई करना स्वाभाविक रूप से कई सवाल भी खड़े करता है।

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आखिर क्या बाकी अधिकारी भी इसी स्तर की सक्रियता दिखा रहे हैं, या फिर अवैध शराब के खिलाफ असली लड़ाई का भार कुछ चुनिंदा अधिकारियों के कंधों पर ही है? विभागीय आंकड़ों के अनुसार प्रेरणा बिष्ट ने जनवरी से मार्च 2026 के बीच 72 मामलों में कार्रवाई की।

इस दौरान विदेशी शराब, देशी शराब, बीयर और कच्ची शराब की बड़ी मात्रा बरामद की गई। इसके बाद अप्रैल से जून के बीच अभियान और तेज हुआ तथा 75 मामलों में कार्रवाई की गई। कुल मिलाकर छह महीनों में 147 प्रकरण दर्ज होने का विवरण उनके कार्यक्षेत्र से सामने आया है, जबकि जनपदीय प्रवर्तन और अन्य कार्रवाई को जोड़ने पर उनकी कुल सक्रियता 208 मामलों तक पहुंचती है।

आंकड़ों से यह भी स्पष्ट है कि प्रेरणा बिष्ट की कार्रवाई केवल मुकदमे दर्ज कराने तक सीमित नहीं रही। उनके नेतृत्व में विदेशी शराब, देशी मदिरा, बीयर और कच्ची शराब की बड़ी खेप बरामद हुई, जिससे न केवल शराब तस्करों के नेटवर्क पर चोट पहुंची बल्कि सरकार के राजस्व की सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान मिला।

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आबकारी विभाग में प्रेरणा बिष्ट पहले भी अपनी सख्त कार्यशैली के कारण चर्चा में रही हैं। अवैध शराब के खिलाफ लगातार छापेमारी, तस्करों पर त्वरित कार्रवाई और संवेदनशील क्षेत्रों में प्रभावी निगरानी के कारण उनकी पहचान एक सक्रिय और परिणाम देने वाली अधिकारी के रूप में बनी है।

यही वजह है कि शराब माफिया के बीच उनका नाम सख्ती के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। हालांकि इन आंकड़ों के सामने आने के बाद विभाग के अन्य अधिकारियों के प्रदर्शन पर भी चर्चा शुरू हो गई है। यदि एक अधिकारी छह महीने में इतनी बड़ी संख्या में कार्रवाई कर सकती हैं, तो बाकी क्षेत्रों में इसी स्तर की सक्रियता क्यों नहीं दिखाई देती? यह सवाल विभागीय समीक्षा का विषय भी बन सकता है।

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कुल मिलाकर छह महीने के ये आंकड़े यह साबित करते हैं कि यदि इच्छाशक्ति, सतर्कता और नियमित फील्ड मॉनिटरिंग हो तो अवैध शराब के कारोबार पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। आबकारी निरीक्षक प्रेरणा बिष्ट का प्रदर्शन न केवल विभाग के लिए एक उपलब्धि माना जा रहा है, बल्कि अन्य अधिकारियों के लिए भी एक उदाहरण बनकर उभरा है कि सरकारी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी ईमानदारी और मुस्तैदी के साथ कैसे किया जाता है।

यदि प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह की सक्रियता देखने को मिले, तो शराब तस्करी पर और अधिक प्रभावी नियंत्रण संभव हो सकता है।