बिल का खेल और खबरनवीस का कमाल ! नेता पुत्री का बिल बना प्रतिष्ठा का सवाल…

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देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों नेताओं से ज्यादा चर्चा एक ऐसे खबरनवीस की हो रही है, जिसने पत्रकारिता और “सेटिंग विज्ञान” के बीच की रेखा को लगभग समाप्त कर दिया है। कहा जा रहा है कि जनाब अब खबर लिखने से ज्यादा खबरों को “मैनेज” करने के मिशन में जुटे हुए हैं। ताजा मामला बद्री-केदार मंदिर समिति से जुड़े नेताओं के होटल बिलों का है, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर पत्रकारिता के चौपालों तक खूब हलचल मचा रखी है।
सूत्रों के अनुसार आरटीआई में कुछ ऐसे दस्तावेज सामने आए जिनमें मंदिर समिति से जुड़े नेताओं के होटल प्रवास और बिल भुगतान को लेकर कई सवाल खड़े हुए। आरटीआई के इस खुलासे के बाद जहां लोग तथ्यों की तलाश में जुटे थे, वहीं एक चर्चित खबरनवीस कथित तौर पर तथ्यों को नया आकार देने की कवायद में लग गया।
बताया जा रहा है कि केदारनाथ यात्रा के दौरान एक प्रभावशाली नेता की पुत्री के होटल प्रवास का बिल राजनीतिक चर्चाओं का विषय बना हुआ था। सवाल यह था कि आखिर बिल का भुगतान किसने किया और किस माध्यम से किया गया। लेकिन इन सवालों के जवाब तलाशने की जगह अब कथित तौर पर होटल व्यवसायी पर ही दबाव बनाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। चर्चाएं हैं कि खबरनवीस होटल संचालक से ऐसा बयान दिलवाने में जुटा हैं जिसमें यह कहा जाए कि संबंधित बिल का भुगतान नकद किया गया था। अब यह अलग बात है कि नकद भुगतान की यह कहानी उतनी ही रहस्यमयी लग रही है जितनी चुनाव से पहले नेताओं की अचानक बढ़ी जनसेवा। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि कोई भुगतान वास्तव में हुआ है तो उसके प्रमाण भी होने चाहिए, लेकिन यहां प्रमाणों से ज्यादा बयान तैयार कराने की कवायद चर्चा में है। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर एक पत्रकार को किसी होटल व्यवसायी के भुगतान संबंधी बयान की इतनी चिंता क्यों सता रही है? क्या यह पत्रकारिता का नया अध्याय है या फिर किसी और स्क्रिप्ट का मंचन? दिलचस्प बात यह है कि उक्त खबरनवीस पहले भी अपने विवादित कारनामों को लेकर चर्चा में रहा है। कभी सत्ता के गलियारों में सक्रियता, कभी नेताओं के करीबी होने की चर्चाएं और कभी खबरों के चयन को लेकर उठते सवाल। लेकिन इस बार मामला सीधे-सीधे एक आरटीआई खुलासे के बाद कथित दबाव बनाने तक पहुंच गया है।

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पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना माना जाता है, लेकिन यहां तस्वीर कुछ उल्टी दिखाई दे रही है। सवाल पूछने के बजाय सवालों को ही गायब करने की कोशिशें चर्चा में हैं। जानकार तंज कसते हुए कह रहे हैं कि अब खबरें लिखी नहीं जातीं, बल्कि परिस्थितियों के हिसाब से “एडिट” कराई जाती हैं। उधर होटल व्यवसायियों के बीच भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर फुसफुसाहट तेज हो गई है। कई लोग इसे दबाव की राजनीति और प्रभावशाली लोगों को बचाने की कवायद के रूप में देख रहे हैं। हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई सामने आने को तैयार नहीं है, लेकिन बंद कमरों में इस मुद्दे पर खूब चर्चाएं हो रही हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि सब कुछ पारदर्शी है तो फिर बयान दिलवाने और कहानी गढ़ने की जरूरत क्यों पड़ रही है? और यदि आरटीआई में सामने आए तथ्य गलत हैं तो उन्हें दस्तावेजों के जरिए चुनौती क्यों नहीं दी जा रही? उत्तराखंड की राजनीति और पत्रकारिता के इस दिलचस्प गठजोड़ पर अब सभी की निगाहें टिकी हैं। क्योंकि यहां कहानी सिर्फ एक बिल की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जहां कभी-कभी खबर से ज्यादा खबर बनाने वाले लोग सुर्खियों में आ जाते हैं।