उत्तराखंड जल संस्थान में बजट की बंदरबांट पर रोक: अब रख-रखाव के खर्च के लिए अध्यक्ष की मंजूरी अनिवार्य

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उत्तराखंड में पेयजल योजनाओं के रख-रखाव और मरम्मत के बजट में निचले स्तर पर होने वाली वित्तीय गड़बड़ियों और हेराफेरी को रोकने के लिए जल संस्थान ने सख्त कदम उठाए हैं। अब योजनाओं की मेंटेनेंस, सामान्य मरम्मत और गर्मियों में पेयजल व्यवस्था सुचारू रखने के लिए मिलने वाले भारी-भरकम बजट के इस्तेमाल के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया गया है।

पहले जहां सालाना सवा करोड़ रुपये के इस बजट से जुड़ी तमाम औपचारिकताएं और मंजूरियां केवल डिवीजन और मुख्यालय स्तर के बीच ही गुपचुप तरीके से निपटा ली जाती थीं, वहीं अब किसी भी कार्य के लिए जल संस्थान मैनेजमेंट को सीधे अध्यक्ष जल संस्थान से अनिवार्य रूप से मंजूरी लेनी होगी। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य बजट आवंटन में होने वाले भेदभाव को खत्म करना और सरकारी पैसे का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना है।

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जल संस्थान प्रबंधन को अब राजस्व मद के तहत मरम्मत और रख-रखाव में होने वाले एक-एक पैसे के खर्च का पूरा ब्यौरा देना होगा। पेयजल और सीवरेज से जुड़े सामान्य कार्यों के लिए विभिन्न डिवीजनों को जो पैसा मिलता है, उसके लिए अब केवल मुख्य महाप्रबंधक की अनुमति काफी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए मुख्य महाप्रबंधक के साथ-साथ अध्यक्ष जल संस्थान का अनुमोदन भी अनिवार्य कर दिया गया है।

पेयजल सचिव और जल संस्थान के अध्यक्ष रणवीर सिंह चौहान ने स्पष्ट किया है कि नई व्यवस्था के तहत जलोत्सारण और पेयजल की सामान्य मरम्मत मद में दी जाने वाली सभी मंजूरियों की फाइल अध्यक्ष कार्यालय तक जाएगी, जिससे वित्तीय पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी स्तर पर बजट का दुरुपयोग न किया जा सके।

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इस कड़े फैसले के पीछे लंबे समय से बजट आवंटन में चल रहा पक्षपात और मनमानी एक बड़ी वजह रही है, जिस पर अब पूरी तरह शिकंजा कस दिया गया है। दरअसल, अब तक इस बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा सालों से केवल कुछ चुनिंदा डिवीजनों पर ही मेहरबान रहता था और बाकी डिवीजनों को इसकी भनक तक नहीं लगती थी, जिसके कारण इन कार्यों की मंजूरी पर लगातार सवाल उठ रहे थे।

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ॉचाहे वह गर्मियों में पानी की सुचारू सप्लाई का बजट हो, मुख्यालय स्तर से मिलने वाली विशेष मंजूरियां हों, या फिर टैंकरों से पेयजल सप्लाई का मामला हो, सभी डिवीजनों को सामान्य रूप से बजट आवंटित नहीं किया जाता था।

इस गंभीर विसंगति और भेदभाव को देखते हुए ही सचिव पेयजल रणवीर सिंह चौहान ने सीधे अध्यक्ष के रूप में कड़ा रुख अपनाते हुए इस पूरी व्यवस्था पर रोक लगा दी है ताकि सभी क्षेत्रों को समान अधिकार मिल सके।

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