टिहरी की हेंवल घाटी में सुरक्षित है पुरखों की विरासत, विजय जड़धारी के पास हैं बीजों का बैंक

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आज 7 जून को विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस पूरी दुनिया में मनाया जा रहा है। आज सरकारी फूड सेफ्टी विभाग बाजार मे खान-पान की तमाम दुकानो की पड़ताल करेगा। दर्जनो तरह के खाद्य पदर्थों के नमूने लिए जाएंगे। स्वस्थ रहने के लिए शुद्ध भोजन का संदेश दिया जाएगा। जो सिर्फ संदेश तक ही सिमटा रहेगा।

दिवस की रस्म अदाएगी भर होगी लेकिन निजी स्तर पर कुछ ऐसी शख्सियतें भी हैं जिनके लिए हर दिन ही विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस है। जो मल्टीनेशनल बीज कारोबारियों के हाईब्रिड बीजों से टकरा रहे हैं, जीवन के लिए खतरनाक पेस्टीसाइड्स से जूझ रहे हैं, जो जोर दे रहे हैं पुरखों की विरासत की हिफाजत करने पर।

जो स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक परंपरागत बीजों को बचाने के लिए हिमालय की तरह डटे हैं, हिमालय की तलहटी में। जी हां हम बात कर रहे हैं, टिहरी जिले के विजय जड़धारी की। विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस पर विजय जड़धारी के काम पर बात करना जरूरी है। आज भारत खाद्यन के मामले में तकरीबन आत्मनिर्भर है।

कभी अकाल से जूझते भारत देश में हरित क्रांति को अपनाया गया ताकि मुल्क के खेत अवाम की भूख मिटा सकें। उसके लिए खाद और बीजों में कई तरह के शोध कृषि वैज्ञानिकों ने किए। नए रासायनिक खाद और प्रसंस्कृत बीजों से भारतीय खेतों में क्रांति आ गई। भारतीय खेतों की उपज कई गुना बढ़ गई।

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लेकिन अब हरित क्रांति का साइड इफेक्ट भी दिखने लगा है। पता चलने लगा है कि रासायनिक खादों ने खेतों की उर्वरता पर असर डाला है यूरिया- डाई और दूसरे रसायन, कीटनाशक न डाले जांए तो खेत बांझ हो जाएंगे। खेतों में इतनी ताकत नहीं है कि पूरी फसल उगा सकें।

ऐसे माहौल में टिहरी जिले की हेंवल घाटी में एक उम्मीद का चिराग अपनी रोशनी बिखेर रहा है। जो परंपरागत प्राकृतिक खेती किसानी की पुरजोर वकालत कर रहा है। जो रासायनिक खाद और हाईब्रिड बीजों के बजाय पुरखों के सदियो पुराने बीजों को सहेज रहा है उन्हें बचा रहा है और दूसरे किसानो को भी उन बीजों को बचाने और उनके जरिए अपनी खेती को महफूज रखने की वकालत कर रहा है। जी हां उस इंसानी हिमालयी चट्टान का नाम है विजय जड़धारी। बीज बचाओ आंदोलन के अग्रदूत।

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टिहरी जिले में हेंवल घाटी के जड़धार गांव में रहने वाले विजय जड़धारी के पास उत्तराखंड के खेतों में उगने वाला वो हर बीज होगा जो कभी हमारे पुरखों ने उगाया होगा। जिसे खाकर हमारी पिछली पीढ़ी जवान हुई होगी स्वस्थ बनी होगी और मुल्क की हिफाजत के लिए इस्पात का सीना लेकर फौलादी इरादों के साथ सरहदो पर तैनात हुई होगी।

विजय जड़धारी परंपरागत बीजों पर काम कर रहे हैं वे उन्हें बचा रहे हैं उनके पास आपको राजमा दाल की पांच-दस किस्में नहीं 170 किस्मों के बीज मिल जाएंगे। उनके पास उत्तराखंड की वादियों में सदियों से उगने वाले हर धान की नस्ल होगी, गेंहू के बीज होंगे जिस मिलेट को आज पोष्टिक बताया जाता है उसकी हर किस्म होगी। चाहे वो कौंणी हो या चिणा या मंडुवा या फिर झंगोरा और मक्की।

विजय जड़धारी के पास हर किस्म का बीज सुरक्षित हैं। उनका बीज बैंक प्राकृतिक खेती की ओर लौटने वाले किसान के लिए बेशकीमती संग्राहलय से कम नहीं। परंपरागत बीजों को जवान होने के लिए कभी भी किसी कीटनाशक की जरूरत नहीं पड़ी और उनके खेतों को शस्य स्यामला बनने के लिए कभी भी किसी प्रयोगशाला में पैदा किए गए खाद-रसायन की दरकार नहीं रही।

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वो गोबर की खाद पत्तियों की खाद के साथ पले बढ़े और खेत की क्षमता के मुताबिक पैदावार दी। जो ताकतवर थी, जिसमे रोगो से लड़ने की क्षमता थी, जिसके दो कौर ही भूखे की भूख मिटा सकते थे। बहरहाल गुजरे दौर के स्नातक विजय जड़धारी जेन जी के दौर में जल, जंगल, जमीन, प्राकृतिक खेती. और परंपरागत पोष्टिक बीजों वाली किसानी की पैरवी कर रहे हैं।

ताकि उत्तराखंड के खेत और आबादी जहरीले रासयनो से महफूज रहे और स्वस्थ जिंदगी गुजारे। बीज बचाओ आंदोलन के अगुवा विजय जड़धारी के विचार और काम को आज कृषि वैज्ञानिक भी सलाम करते हैं। विजय को कई पुरुष्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है। समाचार 4 U उत्तराखंड के ऐसे सपूत की स्वस्थ शरीर के साथ दीर्घायु की कामना करता है।

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