उत्तराखंड जल संस्थान में बड़ा बदलाव: सिविल इंजीनियर अब नहीं संभालेंगे बिजली के काम

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उत्तराखंड के जल संस्थान की कार्यप्रणाली को अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने के लिए शासन ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिया है, जिसके तहत अब संस्थान में सिविल इंजीनियर बिजली का काम और इलेक्ट्रिकल इंजीनियर सिविल से जुड़े कार्यों को नहीं देखेंगे।

इस अव्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने के लिए दोनों विंगों का कैडर अलग-अलग करने का फैसला लिया गया है, ताकि संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ ही अपने तकनीकी कार्यों को संभालें। इस व्यवस्था को अमलीजामा पहनाने के लिए शासन स्तर पर अपर सचिव पेयजल की अध्यक्षता में एक विशेष समिति का गठन भी कर दिया गया है।

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यह कदम विभाग में तकनीकी गड़बड़ियों को रोकने और काम में पूर्ण पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से उठाया गया है।इस बड़े प्रशासनिक और तकनीकी सुधार के पीछे तीन साल पहले घटित एक बेहद दर्दनाक हादसा मुख्य वजह रहा है। दरअसल, जुलाई 2023 में चमोली जिले में स्थित जल संस्थान के सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट में अचानक करंट फैलने से 18 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी।

इस भीषण हादसे के बाद जब उच्च स्तरीय जांच बैठाई गई, तो एक बेहद चौंकाने वाली तकनीकी लापरवाही सामने आई। जांच में पता चला कि इलेक्ट्रिकल कार्यों से जुड़े इस एसटीपी के रखरखाव और संचालन की पूरी जिम्मेदारी जल संस्थान के सिविल इंजीनियर संभाल रहे थे, जिन्हें इस क्षेत्र का विशिष्ट तकनीकी अनुभव नहीं था।

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गौरतलब है कि इस हादसे के तीन साल बाद जाकर अब अफसरों की नींद टूटी है और उन्हें यह याद आया है कि ऐसी दुर्घटनाओं को दोबारा होने से रोकने के लिए सिविल और इलेक्ट्रिकल का कैडर तुरंत अलग किया जाना बेहद जरूरी है।

दोनों विभागों के कैडर को व्यवस्थित और अलग करने की प्रक्रिया को तेजी से पूरा करने के लिए जो समिति बनाई गई है, उसे तकनीकी बारीकियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। अपर सचिव पेयजल की अध्यक्षता में गठित इस उच्च स्तरीय समिति में तकनीकी विभागों के शीर्ष अधिकारियों को शामिल किया गया है, ताकि भविष्य में कोई खामी न रहे।

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इस विशेष समिति में सीजीएम जल संस्थान, चीफ इंजीनियर जल निगम, प्रमुख अभियंता लोक निर्माण विभाग और मुख्य अभियंता सिंचाई विभाग को बतौर सदस्य नामित किया गया है। यह समिति मिलकर दोनों संवर्गों के पृथकीकरण की रूपरेखा तैयार करेगी ताकि भविष्य में किसी भी सीवरेज या वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट पर तकनीकी चूक की वजह से लोगों की जान जोखिम में न पड़े।